अश्वघोष घर-परिवार त्यागकर जंगल में चले गए। ईश्वर प्राप्ति की लालसा में वह साधना करने बैठे, किंतु मन एकाग्र नहीं हो पाया। शांति की तलाश में कई दिन तक भूखे-प्यासे इधर-उधर भटकते रहने पर भी उनका मन अशांत ही रहा।
वह जंगल में कुछ दूर आगे बढ़े कि एक किसान खेत में हल चला रहा था। खेत जोतते-जोतते वह मस्ती के साथ भगवान के भजन गा रहा था। अश्वघोष उसकी मस्ती देखकर रुके तथा पूछा, भइया, तुम्हारी इस मस्ती का क्या रहस्य है? किसान ने उत्तर दिया, भगवान की कृपा के कारण ही मैं हमेशा प्रसन्न रहता हूं। अश्वघोष ने पूछा, क्या भगवान की कृपा मुझ पर भी हो सकती है?
किसान ने कहा, क्यों नहीं? रात को मेरे पास रुको, तुम्हें भगवान की कृपा का रहस्य स्वयं मालूम हो जाएगा। अश्वघोष किसान के पास रुक गए। किसान ने भगवान को भोग लगाकर दाल-रोटी खाने को दी। स्वयं भी भगवान को समर्पित कर भोजन किया। कुछ ही देर में कई दिनों से भूखे-प्यासे अश्वघोष को गहरी नींद आ गई।
पहली बार उन्हें परम शांति का अनुभव हुआ था। सवेरे उठे, तो उन्होंने किसान को अपने गाय-बैलों की सेवा करते-करते भगवान की प्रार्थना में मस्त देखा। वह समझ गए कि भगवान की कृपा तथा शांति अपने कर्तव्य को त्यागकर वन में भागने से नहीं, अपितु अपने कर्तव्य का पालन करते हुए भगवान का स्मरण करते रहने से प्राप्त होती है।