मार्क्सवाद और रामराज्य-स्वामी करपात्री
प्रकाशक- गीताप्रेस , गोरखपुर
पृष्ठ संख्या -1152 , मूल्य- 150 रुपये
सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया भर में साम्यवाद से लोगों का मोहभंग हुआ है। पर 1957 में करपात्री जी ने मार्क्सवाद पर लेख लिखे थे तो उनका मकसद साम्यवाद के बढ़ रहे ग्लैमर से लोगों को सावधान तो करना था। सोवियत संघ, चीन, यूगोस्लाविया, रोमानिया आदि देशों में यह राजनीतिक दर्शन और व्यवस्था अपने पांव पसार चुकी थी। वहां के लोगों के मन मानस पर और व्यवस्था पर कब्जा करने के अलावा गैरसाम्यवादी देशों में भी मार्क्सवाद समाजवाद, प्रगतिशीलता, समष्टिवाद, सामूहिक नेतृत्व, संघवाद, फासीवाद, जनवाद और सर्वहारा की तानाशाही के नाम पर उथल-पुथल मचाए हुए था।
करपात्रीजी को लगा कि मार्क्सवाद के इस बवंडर में भारत का राजनीतिक दर्शन एक कोने में फेंक देने का उपक्रम चल रहा है। उनकी समझ, विश्वास और दृष्टि के मुताबिक इस दर्शन या परंपरा के लिए रामराज्य का नाम प्रचलित था। इस शब्द का प्रयोग महात्मा गांधी ने आधुनिक ढंग से किया। करपात्री जी मूलरूप में गांधी जी की इसी दृष्टि से प्रभावित थे। पर उन्होंने जो भाषा इस्तेमाल की, उसमें शास्त्रीय संदर्भों और शब्दावली का भरपूर इस्तेमाल था।
हाल ही में प्रकाशित इस पुस्तक का सातवां संस्करण आया है। पहला संस्करण 1957 में आया था, क्योंकि उन दिनों राजनीतिक विचारधाराओं का घमासान मचा हुआ था। उदार साम्यवाद से लेकर सर्वहारा की तानाशाही और लोकतांत्रिक समाजवाद जैसे कितनी ही विचार सारणियां उन दिनों हवा में थीं। करपात्री जी कहते थे कि ये विचारधाराएं असल में एक ही हैं। कोई बुखार सौ डिग्री का होता है तो कोई एक सौ दो, चार, छह और आठ दस तक होता है। होते सभी बुखार हैं, लेकिन डिग्री के अंतर से उनके नाम भी बदल जाते हैं।