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मार्क्सवाद और रामराज्य

Sat, 26 Jul 2014 07:18 PM IST
ज्योतिर्मय
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मार्क्सवाद और रामराज्य-स्वामी करपात्री
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प्रकाशक- गीताप्रेस , गोरखपुर
पृष्ठ संख्या -1152 , मूल्य- 150 रुपये

सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया भर में साम्यवाद से लोगों का मोहभंग हुआ है। पर 1957 में करपात्री जी ने मार्क्सवाद पर लेख लिखे थे तो उनका मकसद साम्यवाद के बढ़ रहे ग्लैमर से लोगों को सावधान तो करना था। सोवियत संघ, चीन, यूगोस्लाविया, रोमानिया आदि देशों में यह राजनीतिक दर्शन और व्यवस्था अपने पांव पसार चुकी थी। वहां के लोगों के मन मानस पर और व्यवस्था पर कब्जा करने के अलावा गैरसाम्यवादी देशों में भी मार्क्सवाद समाजवाद, प्रगतिशीलता, समष्टिवाद, सामूहिक नेतृत्व, संघवाद, फासीवाद, जनवाद और सर्वहारा की तानाशाही के नाम पर उथल-पुथल मचाए हुए था।

करपात्रीजी को लगा कि मार्क्सवाद के इस बवंडर में भारत का राजनीतिक दर्शन एक कोने में फेंक देने का उपक्रम चल रहा है। उनकी समझ, विश्वास और दृष्टि के मुताबिक इस दर्शन या परंपरा के लिए रामराज्य का नाम प्रचलित था। इस शब्द का प्रयोग महात्मा गांधी ने आधुनिक ढंग से किया। करपात्री जी मूलरूप में गांधी जी की इसी दृष्टि से प्रभावित थे। पर उन्होंने जो भाषा इस्तेमाल की, उसमें शास्त्रीय संदर्भों और शब्दावली का भरपूर इस्तेमाल था।
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हाल ही में प्रकाशित इस पुस्तक का सातवां संस्करण आया है। पहला संस्करण 1957 में आया था, क्योंकि उन दिनों राजनीतिक विचारधाराओं का घमासान मचा हुआ था। उदार साम्यवाद से लेकर सर्वहारा की तानाशाही और लोकतांत्रिक समाजवाद जैसे कितनी ही विचार सारणियां उन दिनों हवा में थीं। करपात्री जी कहते थे कि ये विचारधाराएं असल में एक ही हैं। कोई बुखार सौ डिग्री का होता है तो कोई एक सौ दो, चार, छह और आठ दस तक होता है। होते सभी बुखार हैं, लेकिन डिग्री के अंतर से उनके नाम भी बदल जाते हैं।
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तीस साल बाद फिर प्रकाशित हुई किताब

सर्वहारा की तानाशाही वाले साम्यवाद और लोकतांत्रिक समाजवाद भले ही अलग-अलग नामों से समझाए जाते हों, पर वे हैं एक ही तरह के तंत्र। सर्वहारा के नाम पर जो लोग राज करने आते हैं, वही तानाशाही, समाजवाद और धर्मराज्य के नाम पर भी राज करते हैं। जिन लोगों का शासन होता है, न वे बदलते हैं और न ही उनके तौर-तरीके। सिर्फ चेहरे बदल जाते हैं। करपात्रीजी के हिसाब से रामराज्य का आदर्श सबसे अनूठा और अनुकरणीय है। राजा और उसका परिवार सिर्फ लोकरंजन के लिए जीता, सोचता और सांस लेता है। सीता जैसी आदर्श पत्नी और राज महिषी को लोकरंजन के लिए पल भर में तपोवन भेज देता है। राम राज्य के इस आदर्श की को यद्यपि बाद के जमाने में गर्हित और निंदनीय बताया गया। पर करपात्री जी के अनुसार अपनी-अपनी समझ है।

करपात्रीजी ने अपनी पुस्तक में समकालीन राजनीतिक विचारों की समीक्षा करते हुए, राम राज्य को अपनी तरह का लोकतंत्र और कल्याणकारी राज्य बताया है। उनके अनुसार राजा या शासक की तरह नीतिपरायण और न्याय निष्ठ होना चाहिए। उनके अनुसार, राम के राज्य में कुत्ते को भी न्याय मिलता है तो व्यवस्था और नीति अनुशासन का यह अप्रतिम उदाहरण है। यह मान लें कि सारमेय (कुत्ते) को न्याय की कथा क्षेपक है या कपोल कल्पना है तो भी इसमें न्याय के जिस उच्च आदर्श की कल्पना की गई है, वह भी श्लाघनीय है।

पुस्तक करीब तीस साल से उपलब्ध नहीं थी। अब फिर उसे प्रकाशित करने का क्या उद्देश्य है? इस पर संस्थान के प्रमुख राधेश्याम खेमका का कहना है कि करपात्रीजी ने करीब साठ साल पहले जो लिखा था वह अब सही साबित हो रहा है। उनकी सभी बातें सामने नहीं आई हैं। लेकिन मार्क्सवाद को आधार बनाकर जितने भी राज्यों में क्रांति या परिवर्तन आए थे, वे सब बिखर गए हैं। वे व्यवस्थाएं नष्ट भ्रष्ट हुई हैं। लोग महसूस करने लगे हैं कि बेहतर राज्य धर्म और अध्यात्म के मूल्यों के आधार पर ही स्थापित हो सकते हैं। धर्म अर्थात् निष्कलुष और तप त्याग से निखरे व्यक्तियों द्वारा निर्धारित नीति-नियम। करपात्री जी स्वयं इस कोटि के संत थे, पर उन्होंने कोई व्यवस्था नियम नहीं दिए। शास्त्रों की रोशनी में उनका दिग्दर्शन किया है। जिन्हें दर्शन और राजनीति में दिलचस्पी है, उनके लिए इस किताब को पढ़ना एक दिलचस्प अनुभव होगा।
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