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दलित दूल्हे की घुड़चढ़ी

सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 19 Jul 2018 06:12 PM IST
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सुभाषिनी सहगल अली

पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश में कासगंज जिले के निजामपुर गांव में शीतल की बारात पहुंची। बैंड था,  बाजा भी था और शीतल का दूल्हा संजय घोड़े पर बैठा था। यह बहुत बड़ी खबर थी। लेकिन क्यों? दरअसल दूल्हे के साथ साथ 150 से ज्यादा पुलिस वाले चल रहे थे, जिनके पास एके-47 राइफलें थीं। रास्ते में पड़ने वाले हर घर की छत पर पुलिस वाले खड़े थे। तो क्या संजय कोई बड़ा नेता या कुख्यात बाहुबली था? ऐसा नहीं है। उसकी बारात पुलिस सुरक्षा में निकली, क्योंकि वह दलित है। निजामपुर गांव में, जहां उसकी दुल्हन शीतल रहती है, ठाकुरों का वर्चस्व है। उस गांव में कोई भी दलित घोड़े पर बैठकर अपनी बारात के आगे-आगे नहीं चल सकता। जब संजय ने शीतल से शादी करने का फैसला किया, तो उसने घोड़े पर बैठकर बारात निकालने की भी ठान ली थी। ऐसा करना उसका अधिकार है।  देश का संविधान और कानून-व्यवस्था संजय की यह इच्छा पूरी करने के लिए पूरी तरह कटिबद्ध है। फिर भी उसकी छोटी-सी तमन्ना पर पानी फेर दिया गया। वह थाने गया, प्रशासन से मिला, पर सबने कह दिया कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस। निजामपुर में संविधान नहीं, ठाकुरों की ही चलेगी।



संजय उच्च न्यायालय गया और न्यायमूर्तियों ने उसे वापस उसी थाने में जाने की सलाह दी, जहां से वह पहले ही खाली हाथ निकल चुका था। वह थाने गया, फिर मुख्यमंत्री योगी के दरबार में लखनऊ भी गया।  किसी मंत्री ने उसे जिलाधीश के लिए पत्र दे दिया। जिलाधीश ने पत्र देखकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की, जबकि उनका काम संविधान का पालन करना  है, बीच का रास्ता निकालना नहीं। उन्होंने तय किया कि संजय की बारात घोड़े के साथ निकलेगी, पर खामोशी के साथ, बिना ठाकुरों के घर के सामने से गुजरे। इस फैसले के कुछ ही दिन बाद ठाकुरों की बारात निकली, जिस पर कोई बंदिश नहीं थी।


और फिर संजय की बारात पर नई रोक लग गई। ठाकुरों ने पता लगाया कि शीतल के अट्ठारह साल के होने में अभी कुछ महीने बाकी थे। अचानक संविधान के प्रति उनकी निष्ठा चरम पर पहुंच गई और उन्होंने इस विवाह पर रोक लगा दी। संजय और शीतल ने जुलाई तक इंतजार करने का फैसला किया। जबकि गांव के ठाकुरों ने शीतल, उसके परिवार और उसकी बिरादरी को सबक सिखाने की ठान ली। सारे कुएं ठाकुरों की जमीन पर थे। दलितों को उन कुएं से साठ रुपये प्रति घंटे के हिसाब से पानी मिलता था। उनको पानी देना बंद कर दिया गया। दलितों के खेत सूख गए। शीतल के पिता और दूसरे दलित किसानों को दिहाड़ी पर मजदूरी करनी पड़ी। ठाकुरों का कहना था कि यह सब संजय की जिद का नतीजा था।  उसे प्रशासन और न्यायालय से नहीं, ठाकुरों से घोड़े पर चढ़ने की अनुमति मांगनी चाहिए थी। आखिर जुलाई का महीना आया। संजय की घोड़े पर चढ़कर बारात निकालने की इच्छा की बात देश भर में फैल गई थी।  प्रशासन दबाव में था। अंततः संजय को गांव के बीच से अपनी बारात ले जाने की अनुमति मिल गई। बंदूकों के साये में, ठाकुरों के घरों के सामने से बारात निकली। पर उन तमाम घरों में ताले लगे थे। ठाकुरों से यह दृश्य नहीं देखा जा सकता था।


संजय तो फिर भी भाग्यशाली रहा। विगत 29 अप्रैल को राजस्थान के भीलवाड़ा में गांव के सवर्णों ने दूल्हे उदय लाल को घोड़ी से उतारकर उसकी और उसके परिवार की खुलेआम बेइज्जती कर डाली थी। मध्य प्रदेश में पिछले एक साल में 38 दूल्हों को घोड़ों से जबरन उतार दिया गया। विगत 31 मार्च को गुजरात में 21 साल के प्रदीप राठोड़ को इसलिए मार डाला गया, क्योंकि वह गांव में घोड़े की सवारी करने लगा था। शीतल का परिवार घबराया हुआ है, क्योंकि पुलिस अब चली गई है और ठाकुरों के घरों के ताले खुल गए हैं।


 -माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य। 

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