शतरंज की बिसात बिछी हुई है और सब कुछ तय है, खेलने और देखने वाले जानते हैं कि किसकी शह होगी और किसकी मात। कहीं कोई उत्सुक उत्तेजना नहीं, कुछ भी ऐसा नहीं कि अप्रत्याशित की अपेक्षा की जा सके। ऐसे में कुछ ऐसा हो कि कोई शरारती बच्चा दौड़ता हुआ आए और सारी बाजी उलट-पलट दे, तो आपको कैसा लगेगा? कुछ ऐसा ही घटा लाहौर में 13 जुलाई जुमे के दिन। पाकिस्तानी फौज तथा सुप्रीम कोर्ट अपनी सारी गोटियां बिछा चुके थे और 25 जुलाई के चुनाओं का इंतजार कर रहे थे, जब इमरान खान को सिर्फ मात बोलना था। जिन्होंने तयशुदा प्रोग्राम के तहत नवाज शरीफ को चुनाव के पहले सजा दिला दी थी और यह मान बैठे थे कि देश की परंपरा के मुताबिक वह लंदन में बैठे रहेंगे, उन्हें जानकर मायूसी हुई होगी कि वह वापस लौट रहे हैं। अपनी मरणासन्न पत्नी को लंदन के अस्पताल में छोड़ कर पाकिस्तान वापस लौटने का फैसला नवाज की एक ऐसी चाल साबित हुआ, जिससे शह और मात का पूरा खेल बिगड़ सकता है।
2013 के चुनावों में बड़े बहुमत से जीतने के बाद नवाज फूंक-फूंक कर कदम रख रहे थे। वह पाकिस्तान की सर्वशक्तिमान फौज को कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहते थे कि वह 1999 की तरह उन्हें एक बार फिर अपदस्थ कर सके। यह एक आम जानकारी है कि पाकिस्तान की रक्षा नीति और भारत, अफगानिस्तान या अमेरिका से जुड़े विदेश नीति के मामलों पर अंतिम निर्णय इस्लामाबाद के प्रधानमंत्री कार्यालय में नहीं, बल्कि रावलपिंडी में सेना मुख्यालय में लिए जाते हैं। नवाज ने न सिर्फ इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया था, बल्कि कई मौकों पर तो अपमान का घूंट पीकर भी उन्होंने सेना को खुश करने वाले फैसले लिए या अप्रिय फैसले बदले। सबसे अप्रिय प्रसंग तो पिछले वर्ष डॉन लीक के रूप में आया, जब इस अखबार में प्रधानमंत्री निवास में हुई एक बैठक में सेना की आलोचना की खबरें छप गईं और उसकी शिकायत पर नवाज को अपने कई चहेते मंत्रियों और नौकरशाहों को बर्खास्त करना पड़ा। इसके बाद भी बात नहीं बनी और अपनी पसंद के दो सेनाध्यक्षों की नियुक्ति करने के बाद भी वह सेना से रिश्ते सामान्य नहीं रख सके|
नवाज शरीफ मूल रूप से सेना की ही निर्मिति हैं। तानाशाह जियाउल हक ने पंजाब के एक कारोबारी परिवार के नवाज को मुख्य रूप से जुल्फिकार अली भुट्टो और उनकी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मुकाबिल खड़ा किया था। वर्दी वालों की मेहरबानी से वह पंजाब के वित्त मंत्री और मुख्यमंत्री की सीढ़ियां फलांगते हुए दस वर्षों में ही प्रधानमंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचे। पर सारे समीकरणों के बावजूद प्रधानमंत्री बनने के बाद दो कारणों से सेना से उनके रिश्ते कभी सामान्य नहीं थे। एक तो वह भारत से अच्छे संबंधों के हामी रहे। इसके लिए उनकी व्यापारी पृष्ठभूमि काफी हद तक जिम्मेदार है। किसी फौजी के मुकाबले उनके लिए यह समझना आसान था कि कश्मीर या सीमा विवादों के बावजूद भारत से व्यापार पाकिस्तान के हित में है। इस बार तो चुनाव भी उन्होंने भारत से दोस्ती के नाम पर लड़ा था, पर भारत से दुश्मनी की बुनियाद पर खड़ी सेना को समझाना मुश्किल था। इसके अलावा बीच-बीच में वह नागरिक प्रभुता की बात करने लगते हैं। सेना सब कुछ स्वीकार कर सकती है, पर इसे नहीं। यही कारण है कि वह हर बार खूब ठोंक बजा कर अपनी पसंद का सेनाध्यक्ष नियुक्त करने के बाद भी उनसे अच्छे रिश्ते नहीं कायम कर पाए।
25 जुलाई के चुनावों में सेना ने उनके खिलाफ इमरान खान पर दांव लगाया है। क्रिकेट के खिलाड़ी और ऐशो-आराम के शौकीन इमरान मुख्य रूप से जिहादी मानसिकता वाले पूर्व आईएसआई प्रमुख ले. जनरल हमीद गुल द्वारा राजनीति में लाए गए थे। कई चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन करने के बाद इमरान का समय 2013 के चुनाओं के बाद आया, जब वह सेना की शह पर एक बड़ी भीड़ लेकर चुनावों में धांधली का हवाला देते हुए इस्लामाबाद पर चढ़ दौड़े। दम साधे पूरा देश तख्ता पलट का इंतजार करता रहा। धरने के दौरान उनके बड़बोले समर्थक परवेज रशीद खुले आम कह रहे थे कि इसे सेना का समर्थन हासिल है और इसीलिए कानून लागू करने वाली एजेंसियां निष्क्रिय हैं। एक समय तो इमरान ने भी क्रिकेट की भाषा में घोषित कर दिया कि तीसरे अम्पायर की उंगली उठने ही वाली है। नवाज ने उस मौके पर राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए संसद को अपने साथ कर लिया और तीसरे अम्पायर यानी सेना की उंगली नहीं उठ सकी।
इस बार फौज ने खुद वार न कर सुप्रीम कोर्ट का इस्तेमाल किया। सारी न्यायिक मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाते हुए चीफ जस्टिस ने ट्रायल और अपीलीय अदालतों की भूमिका गड्ड-मड्ड कर नवाज और उनकी वारिस मरियम को सजाएं सुनवा दी। सभी को उम्मीद थी कि देश के दूसरे नेताओं की तरह बाप-बेटी बाहर शरण ले लेंगे और चुनाव में इमरान को खुला मैदान मिल जाएगा। फौजियों ने सिंध में एमक्यूएम को तोड़ कर पाकिस्तान सरजमीन पार्टी और बलूचिस्तान में मुस्लिम लीग (नवाज) में दरार डाल कर बलूच अवाम पार्टी बनवाने के अतिरिक्त कई नवाज समर्थकों को निर्दलीय लड़वा दिया है। रोचक है कि एक समय नवाज के विश्वासपात्र पूर्व गृह मंत्री चौधरी निसार समेत बहुत से निर्दलीय उम्मीदवारों को जीप चुनाव चिह्न दिया गया है और उन्हें जीप पार्टी कहा जा रहा है।
सोची-समझी रणनीति के तहत नवाज शरीफ के लौटते ही फौज का खेल खराब हो गया है। कुछ ही दिनों पहले तक इकतरफा लगने वाला चुनाव अब कांटे का हो गया है। 13 जुलाई को जिस तरह सारी बंदिशों को तोड़ते हुए नवाज की पार्टी मुस्लिम लीग (एन) के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे उससे चुनाव मुकाबले के हो गए हैं। चुनाव के बाद अगर जरूरत पड़ी, तो जीप पार्टी इमरान के साथ खड़ी होगी, लेकिन दूसरी तरफ ऐसे संकेत भी मिलने लगे हैं कि आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी पुरानी रंजिश छोड़ नवाज के साथ दिखेगी। कुल मिलाकर अब पहले की तरह नहीं कहा जा सकता कि इमरान ही जीतेंगे।