फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शादियां करवाएं या रैलियां!

Sun, 09 Mar 2014 06:52 PM IST
सहीराम
विज्ञापन
विज्ञापन
वैसे तो जी, इधर चुनाव आया-चुनाव आया का शोर मच चुका है। मुनादी हो चुकी है। अब तंबू-कनात वालों के सामने समस्या यह है कि वे शादियां करवाएं या रैलियां। मामला दोनों ही तरफ वरण का है। फिर बताते हैं कि एक तंबू माफिया भी अस्तित्व में आ चुका है। तो बेशक कुछ तंबू उखड़ेंगे, तो कुछ जमेंगे। फिलहाल तो इधर शादियों के लिए सब बारातघर और रैलियों के लिए सब पार्क बुक हो चुके हैं। सब भोंपू बुक हो चुके हैं। रैलियों की भीड़ ढोने के लिए वाहन भी बुक हो चुके हैं। नेताओं के भाषण लिखे जा चुके हैं। रिहर्सलें हो चुकी हैं। ललकारें उठने लगी हैं। चीख-पुकार कांव-कांव में तब्दील हो चुकी है। हर साल-छह महीने में यह शोर मचता ही रहता है।
विज्ञापन


आजकल एक नया शोर भी सुनाई दे रहा है-बाघ आया, बाघ आया। भेड़िया आया-भेड़िया आया कहावत में है, जबकि बाघ का आना हकीकत है। बाघ जरूरी नहीं है कि बाघ ही हो। हालांकि वह शेर नहीं हो सकता। शेर तो बताते हैं कि अब गिर के जंगलों में ही रह गए हैं और गुजरात वाले उन्हें मध्य प्रदेश तक भेजने का विरोध करते हैं। वैसे तो बाघ भी कहां हैं? शिकारियों को एक-आध मिल जाए, तो बात अलग है। सुना है कि चीन तक में यह इंतजार रहता है कि हिंदुस्तान में कोई तो बाघ मिले। बाघ जरूरी नहीं है कि बाघ ही हो। वह तेंदुआ भी हो सकता है। पिछले दिनों मेरठ में तो उसने कर्फ्यू ही लगवा दिया था। कभी दंगे के वक्त कर्फ्यू लगते थे, अब तेंदुए के कारण लगता है। हालांकि दंगे भी यही याद दिलाते थे कि आदमी में पशुता बाकी है और तेंदुए भी यही याद दिलाते हैं कि जंगलों की जगह हमने कंकरीट के जंगल खड़े कर दिए हैं।

पिछले दिनों मुंबई में एक कुत्ते ने तेंदुए को दौड़ा लिया। अपने को शेर वाली बहादुरी से लैस माननेवाले वीर पुरुष सावधान हो जाएं, क्योंकि कुत्ता प्रजाति अब काफी शक्तिशाली हो चुकी है। उसने मनुष्य जाति के साथ गठजोड़ कर लिया है। खतरा तो शेर, बाघ, तेंदुए, या फिर इन्सान को है।
विज्ञापन
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें