भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, 2011 के बाद से मार्च में इतना तापमान नहीं पहुंचा है। इससे आगामी महीनों में लू चलने की आशंका भी बढ़ गई है। मौसम की इस असामान्यता का आंशिक कारण इस बार ठंड के मौसम का अपेक्षाकृत शुष्क होना बताया जा रहा है। गौरतलब है कि बीती फरवरी, 1901 के बाद से अब तक की तीसरी सबसे शुष्क फरवरी रही। जनवरी और फरवरी में अखिल भारतीय वर्षा मात्र 16 मिमी रही, जो सामान्य से 60 फीसदी कम है। आमतौर पर सर्दियों में उत्तरी भारत में बादल और बारिश लाने वाले पश्चिमी विक्षोभ में कमी ही वर्षा में गिरावट की वजह बनी।
सर्दियों के बाद जब मिट्टी नम होती है, तो गर्मी शुरू होने से पहले कुछ नमी वाष्पित होती है, पर कम या बिल्कुल भी बारिश न होने पर सूखी जमीन तेजी से गर्म हो जाती है, जिससे तापमान बढ़ जाता है। ये मौसमी स्थितियां जलवायु के बदलते पैटर्न की ओर इशारा करती हैं, जो किसी एक राज्य तक सीमित नहीं हैं। मार्च, 2026 में विभिन्न भारतीय राज्यों में मौसमी तापमान औसत चार से लेकर बारह डिग्री अधिक दर्ज किया गया। इसको देखते हुए ही, मध्य व पश्चिमी भारत में स्थानीय स्तर पर मौसम संबंधी चेतावनियां भी जारी की जा चुकी हैं।
जाहिर तौर पर तापमान में अचानक हुई वृद्धि का सीधा असर खड़ी रबी फसलों पर पड़ेगा। ऐसे में, सरसों, गेहूं, चना, मूंगफली, तिल, ज्वार इत्यादि फसलों के अलावा आलू व सेब की फसलों को भी अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होगी। मिट्टी में नमी का स्तर बनाए रखने के लिए बार-बार सिंचाई से फसलों को बचाने में मदद मिल सकती है। बहरहाल, यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न ग्रीन हाउस गैसों, वनों की कटाई और अनियोजित शहरीकरण ने मौसम को कितना अस्थिर बना दिया है। मार्च में मई-जून जैसी गर्मी बदलते मौसमी चक्र का एक और संकेत है। अगर अब भी इसे गंभीर चेतावनी के रूप में नहीं लिया गया, तो आने वाले वर्षों में स्थितियां अधिक चुनौतीपूर्ण ही होंगी।