नेपाल में लंबे समय से जारी राजनीतिक गतिरोध उस वक्त खत्म हो गया, जब वहां की माओवादी पार्टी ने संविधान सभा में शामिल होने के प्रति अपनी सहमति जता दी। इस तरह से कहा जा सकता है कि नेपाल में सरकार गठन एवं नए संविधान की राह प्रशस्त हो गई है, लेकिन नेपाल के कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को इस बात पर संदेह है कि नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में गठित होनेवाली संभावित सरकार को माओवादी चैन से काम करने देंगे। विश्लेषकों के इस संदेह का कारण माओवादियों की पिछली कारगुजारी है।
अप्रैल, 2008 में संविधान सभा के पहले चुनाव में पुष्पकमल दहल प्रचंड के नेतृत्व में माओवादियों ने जर्बदस्त बढ़त हासिल कर सत्ता प्राप्त की थी। प्रचंड के नेतृत्व में बनी सरकार से नेपाल की जनता को काफी अपेक्षाएं थीं। लेकिन नेपाली जनता की अपेक्षाओं पर माओवादी खरे नहीं उतरे। यही वजह है कि इस बार चुनाव में माओवादियों की करारी हार हुई। चुनाव परिणाम के बीच ही जब प्रचंड ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा किया, तो उनकी पिछली जीत पर भी सवाल उठने लगे। चुनाव परिणाम के बाद तो प्रचंड ने संविधान सभा का बहिष्कार करने की धमकी दे दी।
जबकि नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष सुशील कोइराला लगातार विभिन्न दलों के साथ बैठकों कर आम सहमति बनाने में जुटे हुए थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार बना लेना ही लोकतंत्र की कामयाबी नहीं है। हमें आम जनता को लोकतंत्र की अनुभूति भी कराना होगा। यह तभी संभव है, जब नेपाली कांग्रेस के अलावा नेपाल की बेहतरी, तरक्की तथा खुशहाली की सोच रखने वाले अन्य दल भी हमारे साथ हों।
दरअसल नेपाली कांग्रेस और एमाले यह बखूबी जानते थे कि माओवादियों के बिना संविधान निर्माण से लेकर सरकार संचालन तक में कई तरह की बाधाएं सामने आएंगी। माओवादी इस समय भले ही संविधान सभा में शामिल होने के लिए तैयार हो गए हैं, लेकिन आने वाले दिनों में उनके द्वारा सरकार को संकट में डालने की आशंका खारिज नहीं की जा सकती। नेपाली कांग्रेस भी इसे लेकर गंभीर मंथन में है। बहरहाल, देश के तीनों प्रमुख दल नेपाली कांग्रेस (एनसी), सीपीएन-यूएमएल व यूसीपीएन-एम चार सूत्रीय समझौते पर राजी हो गए।
नए समझौते में एक संसदीय बोर्ड के गठन की बात की गई है, जो कथित चुनावी धांधली की जांच करेगा। इसके अलावा गृहयुद्ध के दौरान सरकारी सुरक्षा बलों तथा पूर्व विद्रोहियों की ओर से किए गए अत्याचार के मामले की जांच के लिए सत्य एवं सुलह आयोग का गठन करने पर भी सहमति बनी है। माओवादियों ने प्रचंड को कथित चुनावी धांधली की जांच करने वाले संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाने की मांग की है, जो उसके इरादों को दर्शाती है। साथ ही, छह महीने के भीतर नया संविधान तैयार करने व साल भर के भीतर लागू करने पर भी सहमति बनी है।
माओवादियों के इरादों पर संदेह अनायास नहीं है। लोकतंत्र बहाली के नाम पर उन्होंने जो जनयुद्ध चलाया, उसके निशाने पर एक तरफ भारत था, तो दूसरी तरफ नेपाली कांग्रेस। नेपाली कांग्रेस को माओवादी भारत समर्थक दल मानते हैं। जबकि माओवादी पार्टी के मुखिया प्रचंड चीन को तवज्जो देते हैं। नेपाल से बिजली खरीदने की भारत की इच्छा भी माओवादियों को रास नहीं आई। ऊर्जा और आईटी के क्षेत्र में नेपाल में निवेश बढ़ाने की भारतीय योजना को माओवादी नेपाल में भारत का दखल मान रहे हैं।
चुनाव में पराजय के बाद माओवादियों ने जनादेश को जिस तरह चुपचाप स्वीकार कर लिया है, वह बात वहां के राजनीति के विश्लेषकों को हजम नहीं हो रही। तराई इलाके के एक प्रमुख माओवादी नेता के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में नेपाल के विभिन्न शिविरों में रह रहे19 हजार माओवादी लड़ाकों से क्षेत्रीय नेता संपर्क साधने में जुटे हैं। प्रचंड से अलग हुआ मोहन किरन वैद्य गुट फिर प्रचंड के करीब आ रहा है। ऐसे में यह आशंका गहरा रही है कि कहीं नेपाली जनता के हित के नाम पर बेढब मांगों के बहाने माओवादी खून-खराबे वाले अपने पुराने रास्ते पर न लौट पड़ें।