भगवान धरती पर उतरे हैं; और भगवान जब-जब अवतरित होते हैं, विनाश तो होता ही है! क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा प्लेइंग इट माइ वे के छपकर आने के बाद से ऐसा ही कुछ हो रहा है। विनाश के जो संकेत मिल रहे हैं, उनमें मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट और अदालत द्वारा हो रहा और होने वाला खुलासा भी शामिल है। सचिन ने ऑस्ट्रेलिया के महान बल्लेबाज, मगर अत्यंत छोटे इंसान ग्रेग चैपल पर हमला किया है; मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट ने क्रिकेट को घुन की तरह खा रही बीमारियों और उन बीमारियों के जनकों पर उंगली रखी है।
ग्रेग चैपल महज दो वर्षों तक भारतीय क्रिकेट टीम के कोच रहे थे। न सचिन ने लिखा, न किसी ने उनसे पूछा कि क्या भारतीय क्रिकेट का कबाड़ा इन्हीं दो वर्षों में हुआ? सचिन महान क्रिकेटर हैं, मगर बहादुर इंसान नहीं हैं। इसलिए सच बोलने की हिम्मत नहीं कर पाए कभी! उनकी आत्मकथा भी एकदम उन जैसी ही है- बहुत बोलती है, लेकिन कहती बहुत कम है। उनसे कहीं ज्यादा तो उनकी किताब पर की गई हरभजन सिंह की यह छोटी-सी टिप्पणी कहती है कि भारतीय क्रिकेट टीम में तब ऐसी दरार पड़ गई थी कि भारतीय खिलाड़ी ग्रेग के लिए एक-दूसरे की जासूसी करने लगे थे! कौन थे ये खिलाड़ी और ऐसी जासूसी करके उन्हें क्या-क्या फायदा मिला, यह कहने का साहस होता सचिन में, तो भारतीय क्रिकेट का चेहरा आज जैसा नहीं होता।
मुद्गल रिपोर्ट का जितना खुलासा हुआ है, वह यही कहता है कि श्रीनिवासन-मैयप्पन-सुंदर रमन की तिकड़ी आईपीएल में सारे स्याह-सफेद कर रही थी। मगर आईपीएल के घोटालों की कहानी तो ललित मोदी से शुरू होती है, जिसमें हाथ धोने वालों की छोटी-सी सूची में शरद पवार, अरुण जेटली, राजीव शुक्ला, शशांक मनोहर, सुनील गावस्कर, रवि शास्त्री सीधे-ही दिखाई देते हैं। आईपीएल खेल नहीं, खेल का व्यापार करने वालों का धंधा है। इस आईपीएल में कदम-कदम पर क्रिकेट की हत्या होती रही, पर कोई बोला कभी? श्रीनिवासन के मामले में मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट समझ से परे है! उसने एक तरफ तो श्रीनिवासन को बेदाग बताया है, और दूसरी तरफ उनके दाहिने-बाएं हाथों को भ्रष्टाचार में लिप्त बताया है। जिसकी छत्रछाया में यह सब हो रहा है, अगर वह बेदाग है, तब तो मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में हुए किसी भी घोटाले की कोई जिम्मेदारी उनकी नहीं बनती है!
अभी कई कड़वे सवालों का सामना हमें करना है। महेंद्र सिंह धोनी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान हैं, श्रीनिवासन के क्रिकेट-व्यापार के भी कप्तान हैं, और उनके व्यापार-मंडल में भी जिम्मेदारी के पद पर हैं, तो क्या यह दूसरों को डराने वाली भूमिकाएं नहीं हैं? इसकी अनुमति उन्हें कहां से मिली? जवाब सचिन से भी चाहिए, राहुल द्रविड़, गांगुली और अनिल कुंबले से भी, कि जब ग्रेग भारतीय क्रिकेट और क्रिकेटरों के साथ मनमानी कर रहे थे, ललित मोदी क्रिकेट को कैबरे डांस में बदल रहे थे, श्रीनिवासन की घोटालेबाजी जड़ पकड़ रही थी, तब आपने चुप्पी कैसे साध ली? खेल व खिलाड़ियों की मदद करना एक बात है और इस मदद का व्यापार करना एकदम दूसरी बात। राजा हमेशा नंगा ही क्यों होता है, इसका जवाब न मनमोहन सिंह ने दिया, न सचिन ने!