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कितना खरा है सोने का सौदा

Tue, 18 Nov 2014 08:11 PM IST
नारायण कृष्णमूर्ति
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सोने के दाम में हालिया गिरावट उन लोगों के लिए अच्छी खबर है, जो सोने की खरीद के लिए बेसब्र बने हुए थे। दरअसल, एक वर्ष पहले जहां दस ग्राम सोने की कीमत इकत्तीस हजार रुपये थी, वहीं आज इसका दाम चौबीस हजार रुपये तक आ गया है। इतना ही नहीं, हर गुजरते महीने के साथ इसकी कीमत और नीचे जा रही है। शादियों के मौसम में यह खबर जरूर स्वागतयोग्य है, मगर परंपरागत निवेशक इससे घबराए हुए हैं, क्योंकि अभी तक इसे सुरक्षित निवेश माना जाता था। वैसे सोने में निवेश वाकई नुकसान के जोखिम को कम कर देता है, मगर तब, जबकि अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही हो। लेकिन पिछले एक वर्ष के दौरान जहां शेयर बाजार ने मजबूती दिखाते हुए तीस प्रतिशत से ज्यादा का उछाल लिया है, सोने के दाम में बीस प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई है।
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इसे समझने के लिए निवेश के तौर पर सोने के फलसफे को समझना जरूरी है। मसलन, अगर दुनिया का सारा सोना इकट्ठा किया जाए, तो इससे तकरीबन 67 फीट का एक घन बनेगा, जो बड़ी आसानी से क्रिकेट के मैदान में रखा जा सकेगा, ताकि सबकी नजर में आ सके। निवेश गुरू वॉरेन बफे के मुताबिक, दुनिया में मौजूद सारे सोने की कीमत तकरीबन 70 खरब डॉलर होगी, जो अमेरिका के शेयर बाजार के कुल मूल्य का महज एक-तिहाई है। इसी वजह से सोने को निवेश के तौर पर देखने का वह हमेशा विरोध करते हैं, और शेयर बाजार को निवेश का बेहतर विकल्प मानते हैं।

मगर भारत में सोने को निवेश के तौर पर देखने की परंपरा है। भारत में बैंकिंग और वित्तीय समावेशन की उबाऊ प्रक्रियाओं की तुलना में, जिनमें दस्तावेजी कार्रवाइयां ज्यादा होती हैं, सोने को सरल निवेश माना जाता है। इसे बतौर आभूषण भी उपयोग किया जा सकता है। परंपरागत तौर पर भारत दुनिया का सबसे बड़ा सोने का उपभोक्ता देश है। इसके बाद चीन का स्थान आता है। मगर, पिछले दशक के अधिकतर समय में सोने के दामों में बढ़ोतरी के बाद इसका मूल्य तेजी से गिरा है, तो इसकी वजह यह है कि सोने का उपयोग आभूषण बनाने के अलावा कम ही होता है।
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वैश्विक बाजारों में सोने के दाम में गिरावट के बीच जौहरियों और फुटकर व्यापारियों की ओर से मांग में कमी के चलते हालिया कुछ हफ्तों में सोने को लेकर उत्साह कुछ ठंडा ही रहा है। इसके अलावा, कच्चे तेल के दाम चार वर्षों के अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंचने और डॉलर के मूल्य में इजाफे ने वैकल्पिक निवेश के तौर पर इस कीमती धातु की मांग को घटाया है। मोदी लहर की वजह से शेयर बाजार में आए उछाल से चकाचौंध होकर बहुत से निवेशकों ने इस बार अपना पैसा शेयर बाजार में लगाने को तरजीह दी है। इतना ही नहीं, जापान के मंदी में घिरने की खबर से भी डॉलर के मूल्य में बढ़ोतरी हुई है। सोने के बाजार से जुड़े विश्लेषकों की मानें, तो जापान का संकट हाल-फिलहाल सोने से होने वाले मुनाफे को भी सीमित करेगा।

मगर भारत में सोने को लेकर आकर्षण कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। कीमतों में लगातार गिरावट का फिलहाल मांग पर असर नहीं दिख रहा। इससे उपभोक्ता फिर से बाजार की ओर लौटने लगे हैं। दरअसल, सोने के दाम में गिरावट ने खरीदारी का एक अच्छा माहौल तैयार किया है। उदाहरण के लिए, धनतेरस पर मांग बढ़ गई थी, जो त्योहारों के पूरे समय तक बरकरार रही।

समझने वाली बात है कि सोने के दाम में गिरावट लोगों को सोना इकट्ठा करने को प्रेरित कर सकती है, पर इस पीली धातु का बुरा वक्त अभी खत्म नहीं हुआ है। फिलहाल सोने को लेकर परिदृश्य सकारात्मक नहीं दिख रहा। लघु और मध्यमकालीन निवेश के लिए सोना आकर्षक विकल्प नहीं रह गया है, और डॉलर की मजबूती ने निवेश के तौर पर सोने के विकल्प को कमजोर ही किया है। दिक्कत यह है कि सोने की स्थिति में सुधार के कोई संकेत नहीं दिख रहे, और इसके मूल्य में और गिरावट की आशंका भी बनी हुई है।

गौरतलब है कि भारत में सोने के उपभोग में बढ़ोतरी की बड़ी वजह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सोने के आयात नियमों में ढील देना था। पिछले वर्ष अगस्त में आरबीआई ने 80:20 स्कीम शुरू की, जिसके तहत नामित एजेंसियों को सोने का आयात करने की अनुमति तो दी गई थी, मगर इस शर्त पर कि इस आयात के 20 फीसदी हिस्से का निर्यात होना चाहिए। रिजर्व बैंक की शर्तों के चलते पिछले वर्ष मांग काफी कम रही थी। सोने को लेकर कठोर नीति को अपनाने की वजह थी, रुपये के मूल्य में गिरावट को रोकना, जिसकी वजह ऊंचा चालू खाता घाटा था, जो सोने के आयात में लगातार होती बढ़ोतरी का नतीजा था। इसी वर्ष मई में केंद्रीय बैंक ने सोने के आयात नियमों में कुछ ढील दी है। मगर आयात में किसी असामान्य बढ़ोतरी की सूरत में नियामक दखल अवश्यंभावी होगा। सरकार सोने के आयात में बढ़ोतरी को लेकर भी काफी चौकन्नी है।

सवाल उठता है कि इन हालात में निवेशक क्या करें? संपत्ति के तौर पर सोने ने काफी समय से अपना महत्व साबित किया हुआ है। मूल्यों में उतार-चढ़ाव तो अस्थायी है। निवेशकों को सोने को लेकर दीर्घकालीन नजरिया अपनाना चाहिए, और इसकी गिरती कीमत को लेकर नाहक परेशान नहीं होना चाहिए। सरकार अपनी तरफ से सोने की ओर पैसे के प्रवाह पर नियंत्रण लगाने को लेकर गंभीर है। इस क्रम में सरकार ने निवेशकों को सोने के आकर्षण से दूर रखने के लिए किसान विकास पत्र योजना शुरू की है, जिनमें न्यूनतम निवेश एक हजार रुपये का होगा, और सौ महीनों के भीतर जमा धन दोगुना हो जाएगा। देखना होगा कि ऐसी कोशिशें आम लोगों के लिए कितनी लाभप्रद साबित होती हैं।
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(लेखक आउटलुक मनी के संपादक हैं)
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