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मोदी और मुस्लिमों के मन की बात

Mon, 15 Feb 2016 08:12 PM IST
शीतला सिंह
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केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ मुस्लिम धर्मगुरुओं से आईएस (इस्लामिक स्टेट) के प्रभाव, गतिविधि,सक्रियता और इसके प्रति मुस्लिम नवयुवकों के आकर्षण के प्रश्न पर चर्चा के साथ इन गतिविधियों को रोकने में सहयोग की आवश्यकता बताई है। जहां तक भाजपा का संबंध है, वह केंद्र में सत्तारूढ़ तो अवश्य हो गई, लेकिन उसे सबसे बड़ी राजनीतिक कठिनाई यह महसूस होती है, जब उसे हराने के लिए मुस्लिम उनके खिलाफ विरोधियों की मदद करने के लिए एकजुट हो जाता है। उसे समझाने-बुझाने और राजनीतिक लालच का कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि वह यही मानता है कि भाजपा उसकी वैचारिक विरोधी है। उसके कई नेता, जिन्हें भले ही कट्टरपंथी बताया जाए, वे विभिन्न प्रश्नों पर मुस्लिमों को पाकिस्तान भेजने की धमकी देते रहते हैं, क्योंकि उनका प्रचार यही है कि देश के विभाजन के बाद अब मुस्लिमों को इस देश में रहने का नैतिक अधिकार नहीं रह गया है। मुस्लिम भी इन्हें अपना परम विरोधी ही मानता है। जो मुट्ठीभर अल्पसंख्यक भाजपा में शामिल भी हुए हैं, उनका अपने समुदाय में कोई बड़ा प्रभाव नहीं माना जाता।
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मुस्लिम कट्टरपंथियों की अपनी अलग शक्ति दिखाने की कोशिश इसलिए विफल हो जाती है, क्योंकि इसके निहितार्थ यह लगाए जाते हैं कि यह वास्तव में भाजपा का ही समर्थन है। बिहार जैसे राज्य में विधानसभा के चुनाव में जो 2015 में हुए थे, ऐसे मुस्लिम कट्टरपंथियों के उम्मीदवारों की उन छह मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी जमानतें जब्त हो गईं, जहां वे इस अपेक्षा के साथ मैदान में उतरे थे कि यहां तो हम मजहब और उसकी एकजुटता के नाम पर चुनाव जीत ही लेंगे। मुस्लिमों के इस व्यवहार का प्रभाव भी हुआ कि इन क्षेत्रों में भाजपा विरोधी महागठबंधन के उम्मीदवार बड़ी संख्या में जीते। ऐसा नहीं कि मुसलमान भाजपा विरोधी ताकतों से पूर्णतया एकमत और उनका समर्थक हो गया है। निर्णय स्थानीय परिस्थितियों और विकल्पों के आधार पर ही होता है। 35 वर्षों तक बंगाल में वामपंथी चुनाव जीतते रहे, इसमें भी मुस्लिमों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन अब बड़ी संख्या में मुसलमान तृणमूल कांग्रेस के भी साथ हैं, जो भाजपा के साथ केंद्र में सरकार का हिस्सा रह चुकी।

बंगाल में उसकी सरकार बनाने और विभाजित मतदान करने के पीछे भी यही सोच थी कि यहां उसकी परम विरोधी भाजपा तो सत्ता में नहीं आ रही है। अब बंगाल में दूसरा पक्ष भी अपनी रणनीति में परिवर्तन कर रहा है और विधानसभा तक पहुंच गया है। केरल में भी उसकी शुरुआत एक नगर निगम चुनाव में बड़े वोटों से जीत के रूप में हुई है। राजनाथ सिंह भी लखनऊ से लोकसभा के प्रत्याशी थे, तो भी मुस्लिम यहां विभाजित था, जिसका परिणाम यह हुआ कि एक वर्ग दूसरे को हराने के लिए भाजपा के साथ जुड़ा। उत्तर प्रदेश के चुनाव में 'मोदी प्रभाव' को नकारा नहीं जाता, लेकिन इसमें मुस्लिमों का भी मन बदला था कि देखें, क्या होता है। इस प्रकार उसने ‘सबका साथ, सबका विकास’ पर भी एक समूह ने विश्वास किया। केंद्रीय गृह मंत्री, जो भाजपा के अध्यक्ष भी रहे हैं, उनको यह उपयुक्त अवसर लग रहा है कि दो लाभ उठाने ही चाहिए। एक तो यह कि हम आईएसआईएस के खिलाफ आपके साथ हैं और दूसरा यह कि इस समर्थन के फलस्वरूप इस समुदाय में उनकी जो पहचान बनेगी, उसका उन्हें राजनीतिक लाभ हो सकता है।
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