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तमिलनाडु में किसका जादू चलेगा

भास्कर साई
Updated Mon, 15 Feb 2016 08:05 PM IST
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तमिलनाडु में कुछ महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। सूबे की राजनीतिक पार्टियां असंख्य योजनाओं, वायदों और कार्यक्रमों के साथ मतदाताओं से मुखातिब हैं। वस्तुतः ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत कर दी है, और वे गठबंधन बनाने के बारे में सक्रिय हैं। कांग्रेस का द्रमुक से गठजोड़ इसी का सबूत है। मनमोहन सिंह सरकार के समय 2जी मामले में दोनों के बीच पैदा हुई दरार को आसन्न चुनाव की मजबूरी ने पाट दिया है। सत्ताधारी पार्टी अन्नाद्रमुक में सिर्फ मुख्यमंत्री और पार्टी सुप्रीमो जयललिता (कार्यकर्ताओं के लिए अम्मा) ही सारे फैसले लेती हैं, और हाल ही में संपन्न पार्टी की कार्यकारिणी और आम सभा की बैठकों में उन्हें चुनाव से जुड़े तमाम फैसले लेने के लिए अधिकृत किया गया है।


इस चुनाव में वह अपने उस कामकाज को भुनाना चाहती हैं, जो मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने किए। पिछले पांच वर्षों में तमिलनाडु में अम्मा कैंटीन्स, अम्मा सीमेंट, अम्मा वॉटर, अम्मा फार्मेसी जैसी कई अम्मा ब्रांड योजनाएं चलीं। हाल में ही यहां अम्मा कॉल सेंटर की शुरुआत हुई, जो चौबीसों घंटे लोगों की परेशानियां सुनेगा और उनके हल निकालेगा। विपक्षी दलों ने हालांकि सत्ताधारी अन्नाद्रमुक के खिलाफ आरोपों की सूची तैयार की है, लेकिन जयललिता इससे परेशान नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि पिछले दो-तीन महीनों में पार्टी की लोकप्रियता घटने के बावजूद द्रमुक उसका लाभ उठाने की स्थिति में नहीं है। इसलिए जयललिता पीपुल वेलफेयर फ्रंट को साथ लेकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहेंगी। वह इतनी भी अलोकप्रिय नहीं हुई है कि सत्ता में न लौट सके। सुगबुगाहट यह है कि वह भाजपा या तमिल मनीला कांग्रेस या फिर दोनों से गठजोड़ कर सकती है।


चार पार्टियों के गठजोड़ पीपुल वेलफेयर फ्रंट से भी उसके गठबंधन की संभावना तो है ही। चूंकि सारे फैसले जयललिता को ही लेने हैं, लिहाजा यह भी हो सकता है कि उनकी पार्टी अकेले ही चुनाव मैदान में उतरे। द्रमुक की तरफ से अंदरूनी सूचना यह थी कि पार्टी एम के स्टालिन को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर सामने रखकर चुनाव लड़ेगी। लेकिन खुद स्टालिन ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर द्रमुक सत्ता में आई, तो उसके वयोवृद्ध नेता एम करुणानिधि रिकॉर्ड छठी बार राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे। 'नमाक्यू नामे' योजना के तहत पूरे तमिलनाडु का गहन दौरा कर चुके स्टालिन का कहना है कि राज्य की जनता अन्नाद्रमुक के कामकाज से क्षुब्ध है। उनके मुताबिक, हाल ही राज्य में, खासकर चेन्नई में आई बाढ़ पर सरकार ने जिस रवैये का परिचय दिया, वह बेहद हताश करने वाला था। इसके अलावा विभिन्न सरकारी विभागों में भारी भ्रष्टाचार और बढ़ती बेरोजगारी से भी लोग हताश हैं; हालांकि सरकारी अधिकारी बाकायदा आंकड़ों के जरिये इन आरोपों को खारिज करते हैं।


जहां तक द्रमुक का सवाल है, करुणानिधि के बड़े बेटे और स्टालिन के बड़े भाई एम के अझागिरी के कारण पार्टी को चुनाव में मुश्किलें आ सकती हैं। अझागिरी ने अगले कुछ दिनों में अपनी योजनाओं का खुलासा करने की बात कही है। यह भी हो सकता है कि शुरुआती विरोध के बाद वह इस मनमुटाव को भुला दें, जैसे कि मारन बंधुओं ने किया। इस विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी की तरफ सबकी नजर है, वह निस्संदेह अभिनेता से राजनेता बने विजयकांत की पार्टी डीएमडीके है। एक तरफ करुणानिधि ने डीएमडीके को गठजोड़ के लिए आमंत्रित किया है, दूसरी ओर भाजपा के कई नेता विजयकांत से मिलने की कोशिश कर रहे हैं। पर विजयकांत काफी चतुर राजनेता हैं। भाजपा से उनकी बातचीत चल रही है, लेकिन उनकी पार्टी अपने विकल्प खुले रखना चाहती है।


'कैप्टन' इसी महीने अपनी पार्टी की एक बैठक में अपना स्टैंड सार्वजनिक करेंगे कि डीएमडीके चुनाव में किसके साथ जाएगी। लेकिन इतना तो तय है कि उसका लक्ष्य सत्ताधारी अन्नाद्रमुक को पराजित करना है, जिसके साथ उसने 2011 का चुनाव लड़ा था, लेकिन बाद में दोनों में गहरे मतभेद उभर आए। पीपुल वेलफेयर फ्रंट भी एक अच्छा विकल्प है, जिसमें वाइको के नेतृत्व वाली एमडीएमके, भाकपा और माकपा समेत चार पार्टियां हैं, और जो मुख्यधारा की दोनों पार्टियों (द्रमुक और अन्नाद्रमुक) के खिलाफ है। इस फ्रंट ने सत्ता में आने पर भ्रष्टाचार को खत्म करने का वायदा किया है।


पिछले दिनों कुड्डलोर में वाइको ने कहा कि फ्रंट अगर सरकार बनाता है, तो किसी दलित को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। फ्रंट को हालांकि इस अफवाह का भी खंडन करना पड़ रहा है कि वह द्रमुक या अन्नाद्रमुक में से किसी के साथ हो सकता है। उसके मुताबिक, फ्रंट को तोड़ने के लिए ऐसी अफवाह फैलाई जा रही है। पीएमके के संस्थापक एस रामौदास ने करीब एक साल पहले अपने बेटे और पूर्व केंद्रीय मंत्री अंबुमणि रामौदास को पार्टी के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था। अंबुमणि ने बराक ओबामा की शैली में चुनाव अभियान की शुरुआत तो की है, लेकिन बताया जाता है कि आखिरी वक्त में पीएमके भी द्रमुक या अन्नाद्रमुक में से किसी के साथ जा सकती है। लेकिन रामौदास इसे खारिज करते हैं। उनका कहना है कि दोनों द्रविड पार्टियों को छोड़कर अन्य किसी का उनके गठबंधन में स्वागत है, पर उन्हें अंबुमणि को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार करना पड़ेगा। कांग्रेस और भाजपा हालांकि राष्ट्रीय पार्टियां हैं, लेकिन तमिलनाडु में चुनावी सफलता के लिए दोनों क्षेत्रीय दलों पर निर्भर हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने पिछले दिनों भाजपा के द्रमुक के साथ जाने का संकेत दिया था। लेकिन कांग्रेस ने द्रमुक के साथ पहले गठजोड़ का फैसला लेकर भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा कर दी हैं। अगर वह अन्नाद्रमुक के साथ जाती है, तो डीएमडीके और पीएमके को साथ लेने की संभावनाएं खत्म हो जाएंगी। ऐसे में, डीएमडीके ही संभवतः वह विकल्प है, जिसको साथ लेने की भाजपा कोशिश करेगी। कुल मिलाकर, तमिलनाडु में मामूली जनाधार वाली भाजपा के लिए चुनावी संभावनाएं बहुत उज्ज्वल नहीं दिखतीं।


-चेन्नई स्थित वरिष्ठ पत्रकार
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