बीते नौ वर्षों में जब भी प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमला किया गया है, तब-तब उन्होंने पलटवार किया है। ऐसा तब भी हुआ था, जब पिछले लोकसभा चुनाव से पहले लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें 'कमजोर' बताया था। और ऐसा पिछले हफ्ते भी हुआ, जब नरेंद्र मोदी ने उन्हें गांधी परिवार का 'नाइटवाचमैन' कहा। इस बार हालांकि आडवाणी ने हमला नहीं किया, लेकिन 'मेमना' बताए जाने वाले प्रधानमंत्री एक बार फिर 'लौहपुरुष' पर वार करने से नहीं चूके।
आडवाणी उस समय संसद में मौजूद नहीं थे, लेकिन प्रधानमंत्री अपनी पूरी रौ में थे, जैसा कि कभी-कभी ही होता है। उन्होंने न केवल आडवाणी को, बल्कि पूरी भाजपा और नाम लिए बगैर गुजरात के मुख्यमंत्री को भी आड़े हाथों लिया। संयोग से भाजपा और संघ परिवार भी इन दिनों आडवाणी के अगले कदम को लेकर चिंतित हैं। इस लिहाज से आडवाणी के मामले में कुछ भाजपा नेता, संघ परिवार और मनमोहन सिंह की सोच एक जैसी दिखती है।
जहां तक प्रधानमंत्री की बात है, तो उनके जरा-सा भी मुंह खोलने पर लोग ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनते हैं। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर मुद्दों पर तो वह 'मौन' ही रहते हैं। हाल के महीनों में वह संसद में ज्यादातर दुखी ही दिखे। वह अपनी निर्धारित जगह पर बैठे सामने की ओर देखते रहते हैं और क्रोध या पीड़ा व्यक्त करने, मुस्कराने या सलाह लेने के लिए अपने सहयोगियों की तरफ भी नहीं देखते।
लेकिन पिछले दिनों उन्होंने मोदी की टिप्पणी के जवाब में संसद में जो भाषण दिया, वह काफी आक्रामक था। हालांकि उनकी भाषा मुलायम थी, क्योंकि उन्होंने विपक्ष के 'अपशब्द' पर खेद जताते हुए उन्हें याद दिलाया कि 'जो गरजते हैं, वे बरसते नहीं।' विपक्ष का मुकाबला करने के लिए प्रधानमंत्री मोर्चे पर डट गए थे। उनकी देहभाषा भी इसी की तस्दीक करती थी। जब उन्होंने विपक्ष की बखिया उधेड़नी शुरू की, तो भाजपा हैरान थी, जबकि तीन दिन पहले ही नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर करारा प्रहार करते हुए प्रधानमंत्री की भी व्यक्तिगत आलोचना की थी। ऐसे में मनमोहन सिंह का जवाब सोची-समझी प्रतिक्रिया के तहत ही था, क्योंकि पार्टी उनके बचाव में आगे नहीं आई थी।
अमूमन मीडिया से दूर रहने वाले राहुल गांधी ने एक दिन बाद पत्रकारों से बात की, लेकिन वह यह स्पष्ट करने के लिए थी कि प्रधानमंत्री पद उनकी प्राथमिकता में नहीं है और वह पार्टी को पटरी पर लाने में ही दिलचस्पी रखते हैं। उनका आशय यह था कि अगले चुनाव में अगर भाजपा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश करती है, तो वह उनका मुकाबला नहीं करेंगे। इसलिए अब यह प्रधानमंत्री पर निर्भर था कि वह अपना, अपनी सरकार का और अपनी पार्टी का बचाव खुद करें।
पिछले छह महीनों में मनमोहन सिंह ज्यादा मजबूत होकर सामने आए हैं, खासकर तब से, जब से प्रणब मुखर्जी राष्टपति बने हैं। पिछले साल प्रधानमंत्री ने कैबिनेट में फेरबदल अपने ढंग से किया था और मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई जैसे उपायों के जरिये पार्टी नेतृत्व को संकेत दे दिया था कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति में राजकोषीय घाटा कम करने और निवेश को आमंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाने ही होंगे।
यह महसूस कर, कि मजबूत विपक्ष न होने के कारण उनका कोई विकल्प नहीं है, पिछले सप्ताह मनमोहन सिंह ने ऐसे कुछ और फैसले लिए, जो उनकी दृढ़ता जाहिर करते थे। मसलन, प्रधानमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल को शानदार बताने के लिए उन्होंने तथ्यों और आंकड़ों के सहारे अपने नौ साल की तुलना राजग के छह वर्षों से की।
ऐसा करना इसलिए भी जरूरी था कि आगामी लोकसभा चुनाव में किसी नेता को आगे करने के बजाय पूरी कांग्रेस ही भाजपा का मुकाबला करेगी। ऐसे में, जाहिर है, उसके पिछले प्रदर्शन को ही देखा जाएगा। संसद में मनमोहन सिंह की आक्रामकता को इसी परिदृश्य में देखना चाहिए। अचानक कांग्रेस इस पर भी ध्यान केंद्रित करने लगी है कि सोशल मीडिया का कैसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाए, ताकि उस असंतुष्ट शहरी मध्यवर्ग का भरोसा जीता जा सके, जिसने उसे पिछले दो चुनावों में सत्ता दिलाई थी।
प्रधानमंत्री एक बार फिर यूपीए द्वारा सरकार बनाने का भी दावा कर रहे हैं। इस मामले में कांग्रेस का आत्मविश्वास, देर से ही सही, लौट आया है। संसद के सुचारू रूप से चलने और हेलीकॉप्टर घोटाला मामले के फिलहाल नेपथ्य में चले जाने ने ही उसे यह साहस प्रदान किया हो, तो आश्चर्य नहीं। बड़ी बात यह है कि नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर उभरने में अभी समय लग रहा है, क्योंकि कुछ वरिष्ठ भाजपा नेताओं के प्रतिरोध का उन्हें सामना करना पड़ रहा है।
कांग्रेस भी राजग में दरार डालने की कोशिश में है, जिसके लिए उसने मोदी-विरोधी नीतीश कुमार को खुश करने का दूसरा रास्ता चुना है। प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से बिहार सरकार की प्रशंसा की और वहां के राज्यपाल देवानंद कुंवर का तबादला कर दिया, जिनके साथ काम करने में नीतीश कुमार को कठिनाई हो रही थी।
लेकिन वह कर्नाटक के स्थानीय निकायों के चुनाव में आश्वस्त करने वाली जीत है, जिसने कांग्रेस का सर्वाधिक मनोबल बढ़ाया है। अब तक माना जा रहा था कि 2014 में मनमोहन सिंह पद छोड़ना चाहेंगे, लेकिन पिछले हफ्ते अपने जुझारू हस्तक्षेप के जरिये उन्होंने जता दिया कि वह मैदान में डटे हैं, और अगर तीसरी बार कोई संभावना बनती है, तो उनकी दावेदारी से इनकार नहीं किया जा सकेगा। प्रधानमंत्री की आक्रामक छवि के निहितार्थ यही हैं।