फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

मणिपुर : समावेशी अस्मिता की रक्षा का सवाल, नासूर बन सकती है हिंदू बनाम ईसाई की जंग

प्रदीप कुमार
Updated Fri, 19 May 2023 06:51 AM IST

सार

भारत का ही नहीं, संपूर्ण विश्व का इतिहास साक्षी है कि धार्मिक चश्मा छोटे-छोटे जख्मों को नासूर बना देता है। मणिपुर में हिंदू बनाम ईसाई की बात उठाने से पहले राज्य के आधुनिक इतिहास और जनसांख्यकीय स्वरूप की खतरनाक अनदेखी कर दी गई।
विज्ञापन
विज्ञापन
मणिपुर हिंसा। - फोटो : ANI (फाइल फोटो)


मुख्यमंत्री ने नई दिल्ली की यात्रा दस कूकी विधायकों के इस संयुक्त बयान के बाद की, कि पहाड़ी कूकी लोगों के लिए अलग प्रशासकीय यूनिट कायम की जाए। चिंता की बात यह थी कि वक्तव्य पर भाजपा के दो मंत्रियों और पांच विधायकों ने दस्तखत किए। विधायकों ने आरोप लगाया कि कूकियों के खिलाफ हुई हिंसा को भाजपा सरकार का मौन समर्थन हासिल था। अब गंभीर घटनाक्रम यह है कि मुख्यमंत्री के इंफाल पहुंचने के बाद कूकी-चिन-जोमी समुदायों के दस विधायकों ने गृहमंत्री को पत्र लिखकर प्रशासकीय पृथक्करण की मांग दोहरा दी। इस पत्र पर भी सात भाजपा विधायकों के हस्ताक्षर हैं। इन सारे विवाद की पृष्ठभूमि तीन मई और उसके बाद की घटनाएं हैं।

   

मई के पहले हफ्ते में मणिपुर में शुरू हुई मारकाट और आगजनी की तस्वीर काफी हद तक साफ हो चुकी है। स्पष्ट है कि कुछ तत्व पलीते में आग लगाने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे थे। मौका मिला तीन मई को। उस दिन मणिपुर हाईकोर्ट ने इंफाल घाटी के निवासी, मैती समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की याचिका मंजूर कर ली। इसके विरोध में पहाड़ी क्षेत्र के निवासी कूकी लोग हिंसा पर उतर आए। मैती समुदाय को जनजाति का दर्जा मिलने से कूकी इंफाल घाटी में जमीन-जायदाद नहीं खरीद पाएंगे। कूकियों के जनजाति की श्रेणी में होने के कारण अभी मैती पहाड़ी इलाकों में इस अधिकार से वंचित हैं। मामला आर्थिक हितों का था।


हाईकोर्ट के फैसले पर विचार का सरकार को मौका भी नहीं मिला। शासन और प्रशासन गफलत में पाए गए। स्पष्ट हुआ कि खुफिया इनपुट नहीं था और हाईकोर्ट के निर्णय के दृष्टिगत संगठित हिंसा की तैयारी की जा चुकी थी।


पूरी व्यवस्था लकवाग्रस्त पाई गई। पहाड़ के चूड़ाचांदपुर जिला मुख्यालय में चुन-चुन कर मैतियों पर हमले किए जाने लगे। इसका बदला इंफाल में कूकियों से लिया जाने लगा। प्रशासकीय मसले ने हिंदू-ईसाई का रंग ले लिया। प्रचारित किया जाने लगा कि ईसाई कूकी हिंदू मैतियों पर जुल्म ढा रहे हैं। यह भी सामने आया कि कूकी मणिपुर पुलिस की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं करते। कूकी शरणार्थियों ने अर्द्ध सैनिक बलों के पहरे वाले कैंपों में रहने का हठ किया। नफरत इस हद तक फैली कि दोनों समुदायों ने कई जगहों पर एक-दूसरे को बंधक बना लिया।


सेना और अर्द्ध सैनिक बलों की तैनाती के बाद तक हुई हिंसा में, सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 73 जानें जा चुकी हैं, 243 लोग घायल हुए हैं और 46,145 बेघरों को राहत शिविरों में ठहराया जा चुका है। जलाए गए घरों की आग ठंडी होने लगी है, लेकिन कलेजे की आग बुझती नहीं लग रही; अन्यथा गृहमंत्री को लिखे पत्र में विधायक यह नहीं कहते, ‘बड़े स्तर पर आबादी की अदला-बदली तो हो ही चुकी है, इंफाल घाटी में आदिवासी नहीं बचे और पहाड़ों पर मैती नहीं। हमारे लोग मणिपुर सरकार में विश्वास खो चुके हैं और हम घाटी में फिर बसने की सोच भी नहीं सकते, क्योंकि जान-माल की वहां हिफाजत नहीं।’ पहले की तरह मिश्रित आबादी वास्तव में असंभव है? गैर-मैती समुदायों का दिल जीत पाना मुमकिन नहीं? भारत ने कालांतर में इससे भी गहरे जख्म झेले हैं। मणिपुरी समाज में भी वे सभी समावेशी तत्व हैं, जो भारत के अन्य क्षेत्रों में।


एक घटना से आशा का संचार होता है। इंफाल में कूकी शरणार्थियों के शिविर पर पहरा दे रही मैती महिलाओं ने हमला करने पहुंची मैती भीड़ को यह कहकर लौट जाने को विवश कर दिया, ‘हमें मार देने के बाद ही आगे बढ़ पाओगे।’ बात बन सकती है, बशर्ते प्रस्तावित जांच में यह भी शामिल किया जाए : शुद्ध प्रशासकीय और सामाजिक मसले को हिंदू-ईसाई रंग देने वाले कौन थे, कूकियों के इस आरोप की सतह तक पहुंचा जाए कि क्या एन बीरेन सिंह की सरकार ने वास्तव में निष्पक्षता से फर्ज अदा नहीं किया और मणिपुर पुलिस का संप्रदायीकरण हो गया। आखिर यह वैज्ञानिक सत्य है कि शफाखाने का तेल या मरहम सर्जरी का विकल्प हो ही नहीं सकते। मणिपुर का राजनीतिक और प्रशासकीय स्वास्थ्य अब उसी चरण में है। 
विज्ञापन


समुदाय हों या उप-राष्ट्रीयताएं, उनकी पहचान अथवा आकांक्षाओं से उत्पन्न संकटों को संविधान सम्मत विशाल भारतीयता की शख्सियत के दायरे में ही दूर किया जा सकता है। भारत का ही नहीं, संपूर्ण विश्व का इतिहास साक्षी है कि धार्मिक चश्मा छोटे-छोटे जख्मों को नासूर बना देता है। मणिपुर में हिंदू बनाम ईसाई की बात उठाने से पहले राज्य के आधुनिक इतिहास और जनसांख्यकीय स्वरूप की खतरनाक अनदेखी कर दी गई। लंबा समय नहीं हुआ, जब मैती हिंदू समुदाय से तीन-तीन सशस्त्र अलगाववादी संगठन निकले थे। इन संगठनों के पाकिस्तान और चीन से भी संपर्क थे।


ब्रिटिश फौज से युद्ध लड़ चुके (1917-19) कूकियों का इतिहास स्वतंत्रता सैनिकों का है। इसी मणिपुर में नगा-कूकी (दोनों ईसाई),पंगल-मैती (पंगल मुसलमान होते हैं) और कूकी-तमिल संघर्ष हो चुके हैं। म्यांमार की सीमा से सटे, अति संवेदनशील कस्बे मोरेह में करीब बीस हजार तमिल कूकियों के साथ रह रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बनीं दो मैती महिलाओं को भी याद रखना चाहिए : मनोरमा देवी, 2004 में जिनकी हत्या के विरोध में इंफाल में महिलाओं ने निर्वस्त्र प्रदर्शन किया था और इरोम शर्मिला, जिन्होंने अफस्पा के विरुद्ध 16 वर्ष तक भूख हड़ताल की।


धर्म की चाशनी में विवादों को पागते समय भुला दिया जाता है कि इसी पूर्वोत्तर में भारतीय प्रभुसत्ता के खिलाफ हथियार उठाने वाले उल्फा और बोडो के बागी हिंदू थे। लंबे समय तक स्वतंत्र मिजोलैंड के लिए संघर्ष करने वाले ललडेंगा ईसाई थे और एक दिन भारतीय संविधान की शपथ लेकर राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो गए। इस इतिहास की रोशनी में ही मणिपुर में नए युग का आरंभ संभव है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next