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मणिपुर को शांत करना जरूरी

Tue, 27 Dec 2016 07:36 PM IST
अवधेश कुमार
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अवधेश कुमार
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हमारे देश का चरित्र ऐसा हो गया है, जहां पूर्वोत्तर की बड़ी से बड़ी समस्या और आंदोलन भी सुर्खियां नहीं बनतीं। मणिपुर की राजधानी इंफाल को जोड़ने वाले तीन प्रमुख मार्गों की लंबी नाकेबंदी ने वहां के लोगों का जीवन दूभर कर दिया, लेकिन दिल्ली में इसकी तब तक कोई चर्चा नहीं सुनी गई, जब तक पानी नाक से ऊपर नहीं चला गया। कल्पना कीजिए, राजधानी दिल्ली को जोड़ने वाली हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सड़कें जाम कर दी जाएं और यह कई दिनों तक कायम रहे, तो क्या स्थिति होगी? दिल्ली तड़प जाएगी। अगर ऐसा हुआ होता, तो न जाने कब से यह खबर सुर्खियां बनतीं तथा सरकारों पर इसे हटाने का दबाव बनता। किंतु मणिपुर के साथ ऐसा नहीं हुआ। हालांकि नाकेबंदी के करीब 52 दिनों बाद केंद्र ने अतिरिक्त केंद्रीय बल भेजकर समस्या को नियंत्रित करने की कोशिश की है। लेकिन क्या सड़कों को खुलवा देने से समस्या का समाधान हो जाएगा?
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इसका सीधा उत्तर है नहीं। मणिपुर के मैतेयी और कूकी के साथ नगा समुदायों के बीच जो खाई बढ़ चुकी है और वहां की सरकार ने अपनी नासमझी से इसे बढ़ाने में जो भूमिका निभाई है, उसके अंत के बगैर शांति कायम नहीं हो सकती। मणिपुर के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह ने सात नए जिले बनाने की घोषणा क्या की, मणिपुर में आग लग गई। यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) इसका विरोध कर रही है और उसने पहले नाकेबंदी आरंभ की। उसका कहना था कि बिना उसकी सहमति के नए जिलों का निर्माण नहीं होना चाहिए। उसके जवाब में कुकी और मैतेयी समुदाय के लोग भी सड़कों पर उतर आए। इसमें सदर (सलेक्टेड एरिया डवलपमेंट ऐंड एडमिनिस्ट्रेटिव रीजन) उपमंडल सबसे ज्यादा तनावग्रस्त है। सदर हिल्स मणिपुर के लगभग सभी भागों को छूता है। कुकी और दूसरी जनजातियां यहां बसी हुई हैं। नगा ऊपरी इलाके में रहते रहे हैं। 1990 के दशक में दोनों जनजातियों के बीच परस्पर संघर्ष में हजारों मरे और विस्थापित हुए थे। यूएनसी का कहना है कि नगा ही सदर हिल्स के मूल निवासी हैं और कुकी प्रवासी। उसका आरोप है कि राज्य सरकार इस पूरे क्षेत्र को अलग-अलग प्रशासकीय क्षेत्रों में बांटकर उन्हें कमजोर करना चाह रही है।

मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने आगामी विधानसभा चुनाव का ध्यान रखते हुए नए जिलों के गठन का फैसला किया है। उन्होंने गैर नगा समुदाय को यह संदेश दिया कि वे उनको महत्व देते हैं, विकास के प्रति प्रतिबद्ध हैं तथा छोटे जिले बनाकर उनका समाधान करना चाहते हैं। किंतु नगा समुदाय को लगा कि वे उनकी स्वायत्तता खत्म कर जमीन आदि को हड़पना चाहते हैं।
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हाल में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा एवं नगा पीपुल्स फ्रंट को काफी सफलता मिली है। कांग्रेस के अनेक नेता पार्टी छोड़कर भाजपा से जा मिले हैं। असम में जीत के बाद हेमंत विश्वशर्मा लगातार मणिपुर में समय लगा रहे हैं। यूएनसी ने खुलकर कांग्रेस के खिलाफ मत देने का आह्वान किया है। नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (इसाक-मुइवा) यानी एनएससीएन (आईएम) और केंद्र सरकार के बीच समझौते के बाद भाजपा से उसके रिश्ते अच्छे हुए हैं। वैसे भी भाजपा नगालैंड में सत्तारूढ़ एनएफपी के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ है। लेकिन यहां सवाल मणिपुर को बचाने का है। अपने-अपने राजनीतिक हित में विचार करने पर कभी ऐसा नहीं हो सकता है। सुरक्षा बल हिंसा पर काबू पाएंगे, लेकिन शांति बहाली तो राजनीतिक पहल से ही हो सकती है।
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