नोटबंदी के मुद्दे पर विपक्ष को एकजुट करने की कांग्रेस की कोशिश को एक बार फिर झटका लगा है। कई पार्टियों ने मंगलवार को हुई बैठक से किनारा कर लिया। वास्तव में एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस की सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वह क्षेत्रीय दलों से तालमेल नहीं बिठा पा रही है। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में पूरी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं और कांग्रेस को अब वरिष्ठ सहयोगी मानने को तैयार नहीं हैं, जैसा कि बिहार में हुआ।
बहरहाल देश की यह सबसे पुरानी पार्टी 132 वर्ष की हो गई है, तो सबकी निगाहें राहुल गांधी पर लगी हैं, जो अपारंपरिक राजनेता साबित हो रहे हैं। उनके राजनीतिक विरोधियों से ज्यादा कांग्रेस नेताओं का एक तबका ही उन्हें विफल होते देखना चाहता है। पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी, जो 2017 में किसी भी समय पार्टी की कमान संभाल सकते हैं, पर कांग्रेस के कई नेताओं की नजर है। पार्टी के दबंग नेताओं का एक वर्ग यह समझ नहीं पा रहा है कि क्यों राहुल गांधी ने आयकर विभाग के छापे के दौरान बरामद डायरी में दर्ज कथित तौर पर रिश्वत लेने वालों के नामों को सार्वजनिक रूप से उजागर किया। भले ही डायरी में दर्ज 'दादा' नाम को लेकर रहस्य बना हुआ है, पर शीला दीक्षित, दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद और अन्य लोगों के नाम सभी देख सकते हैं।
विमुद्रीकरण से संबंधित कथित अनियमितता के आरोप को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बेनकाब करने का राहुल गांधी का अभियान शायद ही सफल हो, मगर इसमें चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार शीला दीक्षित के साथ ही दिग्विजय सिंह व सलमान खुर्शीद जैसे नेताओं के नाम हैं, और जिसे सामने रखने से राहुल ने गुरेज नहीं किया, जिससे उनकी मानसिकता और आक्रमकता पता चलती है। वास्तव में 2017 कांग्रेस के भीतर सत्ता संघर्ष को लेकर रोमांचक हो सकता है।
कांग्रेस के नेताओं में ऐसी भावना तेजी से बढ़ रही है कि पार्टी प्रमुख के रूप में राहुल की भूमिका उनकी पूर्व भूमिका से बिल्कुल अलग हो सकती है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का नया मुखिया मौजूदा पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी के मुकाबले अपने चाचा संजय या पिता राजीव की तरह ज्यादा ढीठ हो सकता है। जबकि पार्टी प्रमुख के रूप में सोनिया गांधी ने अधिकतम परामर्श की नीति का अनुपालन किया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिवालय और राज्यों में विभिन्न पदों पर बैठे करीब 150 वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं से राहुल गांधी कैसे निपटेंगे। बाहरी दुनिया के लिए भले ही इन पुराने विचारों के नेताओं की कोई प्रांसगिकता नहीं हो या बहुत कम हो, लेकिन कांग्रेस के भीतर उनमें से हरेक स्वच्छंद है और नेताओं का नेता है। उनमें से कई तो राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव, सीताराम केसरी के समय से और सोनिया के 18 वर्षों के नेतृत्व में जमे हुए हैं। बेशक राहुल के प्रति सोनिया का प्रेम निर्विवाद है, लेकिन इन नेताओं को परिवर्तन के किसी भी संकेत को झुठलाने में महारत हासिल है।
राहुल की तात्कालिक चुनौती उत्तर प्रदेश है, जहां वह 2007 के विधानसभा चुनाव से ही कोशिश कर रहे हैं और विफल रहे हैं। राहुल की पटकथा, फोकस और विफलता उनकी जिद, गलतियों से सीखने में अक्षमता और साथ ही नए सिरे से प्रयास करने के बारे में एक अद्भुत कहानी बताती है। हर बार उनके पास बलि के बकरे के रूप में मधुसूदन मिस्त्री, दिग्विजय सिंह और प्रशांत किशोर रहे हैं। इस बार राहुल ने गोल-पोस्ट को भी बदला है। लखनऊ की लड़ाई में राज बब्बर और शीला दीक्षित पर भरोसा करने की रणनीति के बावजूद बीच में प्रशांत किशोर ने अखिलेश यादव से गठजोड़ करने के लिए बातचीत की और राहुल ने बिना सोचे-विचारे हरी झंडी दे दी। शुरुआती चरण में कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन की संभावना को राहुल और अखिलेश के बीच व्यक्तिगत समीकरण के कारण खारिज नहीं किया जा रहा है। पर सिर्फ जितिन प्रसाद ही नहीं, बल्कि राजीव शुक्ला, सलमान खुर्शीद, श्रीप्रकाश जायसवाल, निर्मल खत्री, राजेश पति त्रिपाठी भी समाजवादियों के साथ गठजोड़ के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं।
पंजाब में भी राहुल का साहसिक प्रदर्शन पूरे शबाब पर है। उन्हें कैप्टेन अमरिंदर सिंह की क्षमता पर भरोसा नहीं है। बेशक मुख्यमंत्री पद उम्मीदवार के रूप अमरिंदर सिंह को खारिज नहीं किया गया है, लेकिन वहां निरंतर रवींदर सिंह बिट्टु, प्रताप बाजवा के पक्ष में हवा बह रही है। कुछ अन्य लोग भारतीय सेना के पूर्व कैप्टेन को मात देने की कोशिश कर रहे हैं, जिनमें से एक कांग्रेस के क्षेत्रीय क्षत्रप हैं।
लोगों की नजरों से दूर राहुल गोवा, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी पैनल में अपनी टीम को लोगों को भरने में व्यस्त हैं। पार्टी तंत्र को नियंत्रित करने के उत्साह में राहुल ने कई अवसर भी खोए हैं। यह चौंकाने वाला है कि उन्होंने विमुद्रीकरण के मुद्दे पर आपत्ति जताने के लिए मनमोहन सिंह को चार-पांच राज्यों की राजधानियों में हवाई दौरा करने का अनुरोध क्यों नहीं किया। मनमोहन सिंह और चिदंबरम, दोनों मुखर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दल तैयार करने बजाय अखबारों में लेख लिखने में व्यस्त हैं। यदि ऐसे मुखर कार्यकर्ताओं को तैयार किया जाता, तो वे लोगों के पास जाकर बताते कि नकदविहीन अर्थव्यवस्था कैसे अच्छा और व्यावहारिक नहीं है। न तो पार्टी के भीतर विश्वसनीय थिंक टैंक है और न ही टीवी बहसों में विपक्ष के रूप में पार्टी के किसी प्रतिभाशाली नेता को भेजा जाता है। तो क्या राहुल सफल होंगे। इस पर कांग्रेसी नेताओं का मत बंटा हुआ है, ज्यादातर लोग उनके खिलाफ हैं, तो कुछ उन्हें समय देना चाहते हैं और देखना चाहते हैं कि सोनिया के बिना वह पार्टी को कैसे संभालते हैं। जो भी हो, कांग्रेस अभी जिस स्थिति में है, उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ नहीं है।
-वरिष्ठ पत्रकार और 24-अकबर रोड के लेखक