चंद्रयान मिशन की सफलता के बाद भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम ने नई ऊंचाइयां छूने के लिए अपनी कमर कस ली है। भारत के बहुप्रतीक्षित मंगलयान को पीएसएलवी-सी 25 के जरिये श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया गया है और यह पृथ्वी की कक्षा में पहुंच भी गया है। अब इस महत्वपूर्ण अभियान के दो कठिन चरण बाकी हैं-मंगल की यात्रा पर रवाना होना, और फिर लाल ग्रह की सतह पर उतरना।
इस यान में मंगल ग्रह पर जीवन की खोज में सहायक मीथेन गैस का पता लगाने वाले सेंसर, एक रंगीन कैमरा और वहां खनिज संपदा की खोज करने वाले उपकरण भी मौजूद हैं। इस अभियान के जरिये मंगल ग्रह से जुड़ी तमाम वैज्ञानिक जिज्ञासाओं के समाधान ढूंढने के प्रयास भी किए जाएंगे। इसरो के मुताबिक इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मंगल ग्रह पर जीवन, जलवायु, भूगर्भिक स्थिति और जीवन की उत्पत्ति और संवहनीयता के बारे में आंकड़े जुटाना है।
लेकिन जब पिछले करीब पांच दशक में कई मंगल अभियानों से कोई नई खोज नहीं हुई है, तब भारत समेत पूरे वैश्विक समुदाय के लिए इस मंगल मिशन के निहितार्थ क्या हैं। यह सही है कि वर्ष 1960 से अब तक पूरी दुनिया में ऐसे तकरीबन 45 अभियान हो चुके हैं, जिनमें से एक-तिहाई नाकामयाब रहे हैं। इनमें पूर्व तत्कालीन सोवियत संघ और अब रूस, अमेरिका, यूरोप, जापान और चीन के मंगल अभियान शामिल हैं। भारत का मंगल मिशन विगत विदेशी अभियानों से इस अर्थ में अलग है कि इसमें सबसे कम खर्च आएगा। इसरो अपने इस अभियान में एक बिल्कुल विशिष्ट तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है।
अमूमन प्रक्षेपण यान को अपने गंतव्य ग्रह तक पहुंचाने के लिए केवल एक झटके की जरूरत होती है। लेकिन यह मंगलयान पहले एक माह तक पृथ्वी की कक्षा में ही रहेगा। फिर इसमें मौजूद रॉकेटों में विस्फोट कर इसकी तीव्रता बढ़ाई जा सकेगी, ताकि यह आगे का सफर पूरा कर सके। हालांकि नासा द्वारा मंगल में जीवन की संभावना को खारिज कर दिए जाने के बाद अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को मंगल से कोई नई उम्मीद नहीं है। लेकिन हमारे चंद्रयान ने पिछले अनुमानों को धता बताकर चंद्रमा में पानी होने के सुबूत ढूंढ निकाले ही थे। उसी तरह हमारा मंगलयान लाल ग्रह के बारे में कुछ ऐसी खोज कर सकता है, जिसके बारे में अब तक जानकारी नहीं है।
अगर सब कुछ उम्मीदों के मुताबिक रहा, तो भारत कामयाबी के साथ मंगल मिशन शुरू करने वाले दुनिया के चुनींदा देशों में शामिल हो जाएगा। इसके अलावा भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ की अंतरिक्ष एजेंसियों के बाद चौथी ऐसी एजेंसी बन जाएगी, जिसे मंगल ग्रह पर यान भेजने में कामयाबी हासिल हुई।
हालांकि राष्ट्रीय गर्व के इस अवसर पर मंगलयान को लेकर सवाल और आशंकाएं भी कम नहीं हैं। कुछ आलोचक इसे जमीनी हकीकत से कटा ऐसा अभियान बता रहे हैं, जिसका देश की निर्धन जनसंख्या के हितों से कोई सरोकार नहीं। कहा जा रहा है कि भारत का यह मंगल अभियान एशिया के देशों के बीच अनुचित स्पर्द्धा की शुरुआत कर सकता है। वस्तुतः नवंबर, 2011 में रूस के सहयोग से शुरू हुआ चीन का मंगल अभियान नाकामयाब हो गया था।
ऐसी ही एक कोशिश में 1998 में जापान को भी नाकामयाबी हाथ लगी थी। इन हालात में भारत अपने लिए अवसर ढूंढ रहा है। वह जानता है कि इस मामले में वह यदि चीन को पीछे छोड़ देता है, तो यह विराट उपलब्धि होगी। पिछले वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री ने इस अभियान की बात कही थी। जाहिर है कि लाल किले के प्राचीर से कही गई हर बात राष्ट्र के गौरव से जुड़ी हुई होती है।
लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अंतरिक्ष क्षेत्र में चीन के साथ भारत की तुलना करना बिल्कुल भी मुनासिब नहीं होगा। चीन ने अपना पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष यान वर्ष 2003 में प्रक्षेपित किया था। भारत अभी तक यह लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है। इसके अलावा चीन ने भारत को पीछे छोड़ते हुए 2007 में ही अपने पहले चंद्र अभियान की शुरुआत कर दी थी। वजन उठाने के मामले में भी चीन के प्रक्षेपण यान भारत की तुलना में चार गुना ज्यादा क्षमतावान हैं।
भारत के इस मंगल अभियान पर कई और सवाल भी उठाए जा रहे हैं। कुछ लोग इस मिशन में प्रयुक्त तकनीक की गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे हैं। अमूमन गहरे अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने के लिए जिओ सिनक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वेहिकल यानी जीएसएलवी को ज्यादा उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि उसमें तीन इंजन होते हैं। लेकिन भारत ने अपने मंगलयान को एक इंजन वाले पोलर सैटेलाइट लॉन्च वेहिकल यानी पीएसएलवी से भेजा है, इसकी वजह यह है कि 2010 में दो नाकामयाबियों के बाद जीएसएलवी पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाया है।
इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि इस अभियान को नाहक ही तवज्जो दी जा रही है, क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टि से इस मिशन के उद्देश्य सीमित ही हैं। प्रख्यात अर्थशास्त्री और कार्यकर्ता ज्यां द्रेज के मुताबिक ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह मिशन भारत के महाशक्ति बनने की भ्रामक इच्छा को पूरी करने की एक कोशिश मात्र है। लेकिन इस तरह की आलोचनाओं का कोई बहुत महत्व नहीं है, क्योंकि गरीब देश होने के बावजूद पिछले कुछ दशकों में हमने अंतरिक्ष अभियान के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। गरीब होने का मतलब यह कतई नहीं है कि हम विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में काम ही न करें।