भारतीय समाज में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को परंपरागत तौर पर शोषण और भेदभाव का शिकार होना पड़ा, जिन्हें संविधान के तहत आरक्षण और विशेष संरक्षण की सुविधा दी गई। वी. पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण की सुविधा दी। और अब सामान्य वर्ग के लोगों को आर्थिक आधार पर शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए सरकार ने 124वां संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश किया है। संविधान के अध्याय-3 में मूल अधिकारों के तहत अनुच्छेद-15 में धर्म, जाति, लिंग इत्यादि के आधार पर भेदभाव की मनाही है। अनुच्छेद-16 में यह प्रावधान है कि सरकारी रोजगार में सभी नागरिकों को समान अवसर मिलना चाहिए। अनुच्छेद-15 (6) और 16 (6) के नए प्रावधानों में बदलाव करके सरकार गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की योजना ला रही है। इन संशोधनों के बाद आर्थिक पिछड़ेपन को भी आरक्षण के लिए कानूनी मान्यता मिल जाएगी। संविधान संशोधन के बावजूद इसके लिए चुनावी आचार संहिता लागू होने से पहले प्रशासनिक आदेश या ओएम जारी करने की चुनौती भी सरकार के सामने रहेगी। नए प्रावधानों को संविधान की अनुसूची-9 में शामिल करने के लिए यदि सरकार द्वारा संशोधन किए गए, तभी न्यायिक हस्तक्षेप से बचाव हो सकता है। प्रस्तावित संशोधन संविधान की आत्मा और बुनियादी ढांचे पर कुठाराघात हैं, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द भी किया जा सकता है।
प्रस्तावित आरक्षण का लाभ सिर्फ सवर्णों को नहीं, बल्कि सभी धर्मों के कथित गरीबों को मिलेगा। गांव में 80 फीसदी आबादी के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है और आयकर विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश की 95 फीसदी आबादी की आमदनी आठ लाख रुपये सालाना से कम है। संविधान में जाति और धर्म के नाम पर भेदभाव की मनाही है, पर अब अधिकांश आबादी जाति और आय प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए तहसीलदार कार्यालय के चक्कर लगाएंगे। देश में 11 करोड़ से अधिक युवा मनरेगा मजदूरी के लिए पंजीकृत हैं, परंतु शिक्षित युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था के संकट में आने से खेतिहर युवाओं में रोजगार का संकट है। नोटबंदी और जीएसटी के बाद असंगठित क्षेत्र में भी रोजगार के संकट बढ़े हैं। डिजिटल भारत में इंटरनेट कंपनियों के मजे हैं, पर भारतीय उद्यम दम तोड़ रहे हैं। स्वदेशी, ग्रामस्वराज और घरेलू उद्योग-धंधों को बढ़ावा देने के बजाय सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लॉलीपाप से सामाजिक नक्सलवाद बढ़ने के खतरे हैं।
नरसिंहा राव सरकार ने मंडल की लपटों को शांत करने के लिए 1991 में आर्थिक आधार पर आरक्षण की भी पहल की थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा साहनी के फैसले से निरस्त कर दिया था। फिर यूपीए सरकार ने आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों को आरक्षण देने के लिए जुलाई 2006 में मेजर जनरल (रिटा.) एस. आर. सिन्हो की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया, जिसने वर्ष 2010 में अपनी रिपोर्ट सरकार को दी, जिस पर आठ साल बाद अमल हो रहा है। बिहार में जातिवाद के जहर को कम करने के बजाय 2011 में सवर्ण आयोग का ही गठन कर दिया गया। केरल और गुजरात में आर्थिक आधार पर आरक्षण को उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया और ऐसे अनेक मामलों के खिलाफ अपील सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, आरक्षण की सुविधा आर्थिक विकास के लिए नहीं है, बल्कि यह शोषण और भेदभाव के खिलाफ सांविधानिक सुरक्षा कवच है। न्यायालय के अनुसार, सामाजिक न्याय की व्यवस्था देने के साथ प्रशासन की गुणवत्ता को सुनिश्चित करना जरूरी है, जिसके लिए संविधान के अनुच्छेद-335 में प्रावधान किए गए हैं। मंडल आयोग मामले में न्यायाधीशों ने आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी तक रखने पर जोर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय देश का कानून माना जाता है, इसके बावजूद हरियाणा में 70, तमिलनाडु में 79, महाराष्ट्र में 68, झारखंड और तेलंगाना मे 60, आंध्र प्रदेश में 55 और राजस्थान में 54 फीसदी आरक्षण के प्रावधान किए गए हैं। नए कानून के बाद केंद्रीय स्तर पर 59.5 फीसदी आरक्षण के प्रावधान से सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की राष्ट्रीय अवहेलना के चलन में और बढ़ोतरी होगी। इसके बाद अन्य पिछड़ी जातियों के भीतर अति पिछड़ी जातियों के आरक्षण की मांग जोर पकड़ सकती है। जातिवाद के बढ़ते चलन में जब अपवाद ही नियम बन जाएं, तो देश की पांच फीसदी अनारक्षित आबादी प्रतिस्पर्धात्मक माहौल के लिए विदेश पलायन को बाध्य होगी। भारतीय प्रतिभा के लिए स्टार्टअप योजना के साथ समान कानूनी व्यवस्था की भी जरूरत है, जिससे हमें विदेशी निवेश और एफडीआई के लिए अपने ही लोगों के बीच चिरौरी न करनी पड़े।
आरक्षण के प्रस्तावित कानून को अधिकांश दलों का समर्थन मिल जाएगा। एसएसी-एसटी कानून में बदलाव करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने बेवजह गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी, जिसे केंद्र सरकार ने कानून से बदल दिया। एससी/एसटी कर्मियों के प्रमोशन में आरक्षण के मामले में भी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में पूरी ताकत लगा दी। मोदी सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को सांविधानिक दर्जा दिलाने के लिए संसद में 123वां संविधान संशोधन विधेयक पारित कराया। साफ है कि कानून निर्माण में भी अब राजनीतिक नफा-नुकसान ही सर्वोपरि है, जो संसदीय लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं है। संसद में बिल पेश होने से सरकार और विपक्ष के अनेक विरोधाभास उजागर होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद सरकार डाटा सुरक्षा के लिए कानून नहीं बना पाई, जिसकी वजह से इंटरनेट कंपनियों के 20 लाख करोड़ रुपये के सालाना कारोबार पर टैक्स वसूली नहीं हो पा रही। डाटा पर भी इसी फुर्ती से यदि कानून बन जाए, तो देश के युवा स्वरोजगार से आत्म निर्भर होकर मैकाले की नौकरी संस्कृति की विकृति से भी मुक्त हो सकेंगे। चुनावी राजनीति के नजरिये से आरक्षण को ब्रह्मास्त्र मानने की गलतफहमी भले ही हो, पर नए कानून को न्यायालय की कसौटी पर सही साबित करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा।