दिल्ली में ममता बनर्जी और उनके मंत्री के साथ बदसुलूकी से पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हिंसा पर बहस गरम हो गई। हिंसा और सियासत की इन ताजा घटनाओं पर पश्चिम बंगाल के प्रभारी और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य शकील अहमद से धीरज कनोजिया ने बात की:-
:- दिल्ली में हमला होने के बाद ममता बनर्जी ने सरकार पर सुरक्षा न देने का आरोप लगाया, तो कांग्रेस ने भी उन पर राजनीति करने का आरोप मढ़ दिया। ममता से इतनी तल्खी क्यों?
:- हमने ममता बनर्जी के साथ हुई घटना की निंदा की थी, लेकिन पश्चिम बंगाल में माकपा के छात्र संगठन के युवा नेता की मौत हुई है और उसके परिवार से पार्टी को सहानुभूति है। अलबत्ता एक मुख्यमंत्री और उनके मंत्री को निशाना बनाने का भी हम समर्थन नहीं करते।
:- चूक कहां हुई, दिल्ली से या ममता से?
:- गलती दोनों तरफ से हुई है। ममता बनर्जी कोलकाता में भी सुरक्षा व्यवस्था का इस्तेमाल नहीं करतीं। मैं भी मंत्री रह चुका हूं। जब मैं दिल्ली आता था, तो पर्याप्त सुरक्षा रहती थी। वह तो मुख्यमंत्री हैं। उनके साथ तो ज्यादा लोगों को आना चाहिए। अब बंगाल पुलिस को सुरक्षा देनी थी या दिल्ली पुलिस को, मुझे इसकी जानकारी नहीं। मगर यह कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने मुख्यमंत्री के योजना भवन पहुंचने से पचास मिनट पहले बंगाल के रेजिडेंट कमीशनर के जरिये धरना-प्रदर्शन को लेकर सूचना दी थी और ममता बनर्जी को दूसरे दरवाजे से जाने के लिए कहा गया था। यह बात भी सामने आई है कि ममता की गाड़ी उसी दरवाजे से अंदर गई थी। मगर वह खुद उतर कर उसी दरवाजे की ओर आ गईं, जहां धरना-प्रदर्शन हो रहा था।
:- कोलकाता में नरेंद्र मोदी ममता की तारीफ करते दिखे। क्या इससे भाजपा और ममता की नजदीकी के रास्ते नहीं खुल रहे?
:- यह धारणा बन रही है कि भाजपा और ममता के बीच नजदीकियां है। नरेंद्र मोदी के बयान से इस चर्चा को और बल मिला है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि बंगाल की जनता धर्मनिरपेक्ष है। ममता बनर्जी ने भाजपा के साथ 2004 का लोकसभा चुनाव लड़ा था, तो उन्हें महज एक सीट मिली थी, जो उनकी खुद की थी। पर जब 2009 में उन्होंने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, तो उनकी सीटों की संख्या बढ़कर उन्नीस हो गई। अगर वह फिर भाजपा के साथ जाती हैं, तो घाटा ममता को ही होगा। कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने से ही विधानसभा चुनाव में उन्हें पूर्ण बहुमत मिला था।
:- क्या हम मान लें कि कांग्रेस ममता बनर्जी को अगला लोकसभा चुनाव साथ लड़ने का न्योता दे रही है?
:- नहीं, बंगाल में कांग्रेस को अपना रास्ता खुद बनाना है। वह भी वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस से समान दूरी बनाकर। कांग्रेस के साथ तृणमूल की सीटें तो बढ़कर 19 हो गई, लेकिन कांग्रेस 2004 में भी छह सीट पर थी, तो 2009 में भी इतनी ही सीटों पर कायम रही। जहां तक माकपा की बात है, तो उससे बंगाल की जनता पिछले साढ़े तीन दशक से त्रस्त थी। उसकी तुलना में ममता बनर्जी बहुत कम समय में ही अलोकप्रिय हुई हैं। हम वहां अपने बलबूते लड़ेंगे। कांग्रेस के प्रति वोटरों का रूझान बढ़ा है। विधानसभा उपचुनाव में ममता तीसरे नंबर पर रही हैं, कांग्रेस से पीछे।
:- पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हिंसा पर क्या कहेंगे? वहां तोड़फोड़ की राजनीति चरम पर है।
:- वहां केवल वामपंथियों को नहीं, कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया जा रहा है। वह भी ममता बनर्जी के उस बयान के बाद, जिसमें उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया कि दिल्ली में हुए हमले के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है। इसी का नतीजा है कि बृहस्पतिवार को राज्य में कांग्रेस के दस कार्यालयों को निशाना बनाया गया।