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भाग्य होगा बलवान अगर याद रखेंगे महावीर की यह बात

Wed, 11 Mar 2015 09:04 AM IST
श्रीशंकर देव
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वृक्ष के तले तीर्थंकर महावीर साधना में लीन थे। कई दिन बीत गए थे उन्हें समाधिस्थ हुए। वह ध्यान में लीन थे, और उन्हें अपनी भी खबर नहीं थी। एक दिन पास ही मैदान में एक ग्वाला अपने बैल चरा रहा था। उसे किसी जरूरी काम से गांव जाना पड़ा। उसने सोचा पास में बाबा बैठे हैं, वह बीच-बीच में बैल देख लिया करेंगे, तब तक मैं घर से लौट ही आऊंगा।
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महावीर ध्यानस्थ थे। उन्हें खबर ही नहीं थी कि पास ही कोई उनसे अपेक्षा पाले चला गया है। बैल चरते-चरते दूर निकल गए। ग्वाला लौट कर आया, तो बैल को न पाकर महावीर पर बहुत नाराज हुआ। वह समझा कि यह कोई बाबा नहीं, बल्कि चोर है और इसी की हरकत से बैल कहीं चले गए हैं।

वह महावीर को ताड़ना देने लगा। गुस्सा बढ़ने पर उसने रस्सी के एक टुकड़े से उनकी पिटाई शुरू कर दी। महावीर का ध्यान भंग न हुआ, तो कहते हैं कि उसने महावीर के कान में कील भी ठोक दी। देवराज इंद्र से ग्वाला की यह ताड़ना नहीं देखी गई। उन्होंने तीर्थंकर से आकर प्रार्थना की, भगवन! यह ग्वाला अज्ञानी है, आपसे पूरी तरह अनभिज्ञ है। मेरी इच्छा सदैव आपके साथ रहने की है, ताकि आप पर आने वाले कष्टों का निवारण करता रहूं। आप मुझे सतत सेवा में उपस्थित रहने की आज्ञा दीजिए।
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महावीर ने कहा, स्ववीर्येणैव गच्छन्ति जिनेन्द्रा परमां गतिम्। अर्थात किसी दूसरे के सहारे रहकर अथवा दूसरे के पुरुषार्थ के भरोसे बैठकर आज तक कोई आत्मा बोधि लाभ प्राप्त नहीं कर सकी। सच यही है कि अपने पुरुषार्थ से ही अपना निर्माण किया जा सकता है। अपने भाग्य को बनाने वाला कोई दूसरा नहीं, वरन उसका पुरुषार्थ ही होता है। महावीर के मुख से ये शब्द सुनकर इंद्र चुपचाप चले गए।
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