महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जनादेश भाजपा-शिवसेना के चुनाव पूर्व गठबंधन के पक्ष में आया था, लिहाजा उनकी सरकार बनने में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए थी। मगर आज चौदह दिन बाद जिस तरह से कथानक और किरदार बदल रहे हैं, उसमें महाराष्ट्र की कहानी पेचीदा होती जा रही है। दरअसल सरकार का गठन इसलिए नहीं हो सका है, क्योंकि महाराष्ट्र में नई विधानसभा त्रिशंकु बनकर उभरी है, जिससे यह संभावना पैदा हो गई कि शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस मिलकर वैकल्पिक सरकार दे सकते हैं। इससे कई अर्थों में उभरे उद्धव ठाकरे और मैन ऑफ द मैच बनकर उभरे शरद पवार को अवसर मिल गया कि वे इस हालात का अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करें।
इसने शिवसेना को अवसर दिया कि वह भाजपा के साथ कड़ा मोलभाव करे, और यह आने वाले दिनों में साफ होगा कि आखिरकार उसकी झोली में क्या आया। संकेत हैं कि भाजपा ने मंत्रिमंडल में 50:50 के बंटवारे के सिद्धांत को मान लिया है। पिछले कुछ दिनों में दोनों पक्षों के दूतों के बीच कुछ निगमों के अध्यक्ष पद, केंद्र में कुछ मंत्री पद और राज्य में उपमुख्यमंत्री शिवसेना को देने की बात होने की भी खबरें हैं। मगर अब तक कुछ भी साफ नहीं है। उद्धव ठाकरे नतीजे आने के तुरंत बाद देवेंद्र फडणवीस की इस बात से भड़क उठे कि अगले पांच वर्ष तक वह फिर से मुख्यमंत्री रहेंगे। सेना ने इसे मुख्यमंत्री के 'अहंकार' के रूप में देखा। दरअसल चुनाव से पहले का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें फडणवीस यह कहते हुए नजर आए कि जिम्मेदारियों और पदों का 50:50 बंटवारा होगा। दोनों पक्षों के पास इसकी अपनी अपनी व्याखा है। इसे लेकर शिवसेना आक्रामक हो गई और यह भी माना जाता है कि इसने भाजपा हाई कमान को भी नाराज कर दिया है।
जहां तक पवार की बात है, तो इस चुनाव में उनकी पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया है और उन्होंने भाजपा को कुछ कड़वे पल दिए हैं। नतीजे आने के तुरंत बाद ही उन्होंने बयान जारी किया था कि उनकी पार्टी को विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है। यही बात उन्होंने बुधवार को भी दोहराई। लेकिन उनकी पार्टी के कुछ लोगों ने यह कहते हुए अनिश्चितताओं को जिंदा रखा है कि यदि सेना छत्रपति शिवाजी महाराज के मूल्यों के अनुरूप 'जनता की सरकार' के गठन के प्रस्ताव के साथ सामने आती है, तो उस पर विचार किया जा सकता है। पिछले चौदह दिन से पवार ने राजनीतिक हालात पर जैसा रुख दिखाया है, उसमें भाजपा के लिए स्पष्ट संदेश है, 'मुझे और मेरी पार्टी के नेताओं को परेशान न किया जाए'। ध्यान रहे, चुनाव से ऐन पहले सरकार ने अजीत पवार और प्रफुल्ल पटेल के खिलाफ दर्ज मामलों में अचानक तेजी दिखाई थी। इस चुनाव में उस वक्त निर्णायक मोड़ आया था, जब प्रवर्तन निदेशालय ने खुद शरद पवार को नोटिस भेज दिया। इसके बाद उनका लड़ाका रूप सामने आया और उन्होंने एक दिन में ही छह-सात रैलियों को संबोधित किया। निर्णायक क्षण तब आया, जब सतारा में बारिश के बावजूद उन्होंने रैली को संबोधित किया। नतीजतन कुछ दिन पहले एनसीपी छोड़कर भाजपा में आने वाले छत्रपति शिवाजी के वंशज करीब एक लाख वोट से चुनाव हार गए, जबकि पांच महीने पहले ही उन्होंने वहां से लोकसभा चुनाव जीता था।
पवार इतने नासमझ नहीं है कि वह नहीं जानते कि कांग्रेस में शिवसेना को समर्थन को लेकर हिचक है। कांग्रेस इस मुद्दे पर विभाजित है, राज्य कांग्रेस के नेता किसी भी कीमत पर भाजपा को सत्ता से बाहर रखना चाहते हैं, जबकि राष्ट्रीय नेता 'सांप्रदायिक' शिवसेना को समर्थन नहीं देना चाहते। लेकिन सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद दो दिन विचार करने का समय लेकर पवार ने अनिश्चितिता को जीवित रखा।
यह विडंबना ही है कि इस घटनाक्रम में सबसे बड़ा नुकसान देवेंद्र फडणवीस को हुआ है, भले ही वह महाराष्ट्र के फिर से मुख्यमंत्री क्यों न बन जाएं। भूलना नहीं चाहिए कि भाजपा प्रमुख अमित शाह ने हरियाणा में महज 24 घंटे के भीतर दुष्यंत चौटाला के साथ गठबंधन पर मुहर लगाकर किसी के लिए कोई मौका नहीं छोड़ा था। दूसरी ओर वित्तीय रूप से महत्वपूर्ण महाराष्ट्र में जहां भाजपा-शिवसेना गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला है (हरियाणा के विपरीत जहां भाजपा बहुमत से पीछे थी) पार्टी के रवैये से सरकार गठन का मौका हाथ से निकल भी सकता है। हैरत की बात है कि पार्टी ने गतिरोध दूर करने की जिम्मेदारी फडणवीस पर छोड़ दी है। जाहिर है, इससे फडणवीस का कद घट सकता है। एक समय था, जब पार्टी के पदानुक्रम में उन्हें तीसरे नंबर पर देखा जा रहा था और यह माना जा रहा था कि 2024 में उन्हें 'राष्ट्रीय भूमिका' दी जा सकती है। आरएसएस हलकों में सार्वजनिक रूप से उनकी तारीफ की जा रही थी कि कैसे उन्होंने मराठा आरक्षण आंदोलन, भीमा कोरेगांव हिंसा, बाढ़ और सूखे कारण राज्य में उत्पन्न जटिल स्थितियों को संभाला। 2014 से उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चहेते के रूप में भी देखा जाता है। लेकिन इस बार जब वह दिल्ली में थे और थाईलैंड से प्रधानमंत्री के लौटने का इंतजार कर रहे थे, मोदी ने उनसे मुलाकात नहीं की।
फडणवीस के कमजोर पड़ते ही पार्टी के भीतर से उनके खिलाफ आवाज उठने लगी है। उनके बदले किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की बात हो रही है, लेकिन अभी ऐसा लगता नहीं है, क्योंकि खुद मोदी और शाह दोनों ने ही सार्वजनिक तौर पर उन्हें ही फिर से मुख्यमंत्री बनाए जाने की घोषणा की थी। उन्होंने सुनिश्चित किया था कि इस बार नितिन गडकरी समर्थक चार-पांच मंत्रियों को टिकट न मिले। वहीं फडणवीस के क्षेत्र नागपुर में भाजपा उम्मीदवार की पराजय को कांग्रेस के उभार से कहीं अधिक, गडकरी के सिर फोड़ा गया।
भाजपा और शिवसेना के बीच नए सिरे से बातचीत शुरू हुई है और फिर भी कोई समाधान नहीं निकला, तो महाराष्ट्र राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ सकता है। महाराष्ट्र का संदेश साफ है कि भाजपा को जीत के बावजूद यदि सरकार चलाना हो, तो उसे कुछ झुकना पड़ेगा।