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कैंसर के खिलाफ उम्मीदें

निरंकार सिंह Published by: Raman Singh Updated Wed, 06 Nov 2019 06:54 PM IST
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निरंकार सिंह - फोटो : a

इस साल चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार जिन तीन वैज्ञानिकों अमेरिका के विलियम जी. केलिन जूनियर व ग्रेग एल. सेमेंजा और ब्रिटेन के पीटर जे. रैटक्लिफ को देने की घोषणा की गई, उनकी खोज से कैंसर, एनीमिया और कोशिकाओं से जुड़ी हुई कई अन्य बीमारियों के इलाज का रास्ता खुलेगा। इन तीनों ने मानव कोशिकाओं की कार्य प्रणाली को समझने की दिशा में क्रांतिकारी खोज की है। उन्होंने उस बायोलॉजिकल मशीनरी को पहचाना है, जो आक्सीजन का स्तर बदलने पर जीन की प्रतिक्रिया को नियंत्रित करती है। व्यक्ति के स्वस्थ रहने में यह प्रक्रिया अहम भूमिका निभाती है।



उल्लेखनीय है कि पिछले साल चिकित्सा का नोबेल जिन वैज्ञानिकों को मिला, उनकी खोज से भी कैंसर के इलाज में सहायता मिलेगी। अमरीका के प्रोफेसर जेम्स पी एलिसन और जापान के प्रोफेसर तासुकू हॉन्जो ने मानव शरीर के इम्यून सिस्टम का इस्तेमाल कर कैंसर को निष्प्रभावी बनाने के लिए नया इलाज निकाला है, जिसे 'चेक पॉइंट थैरेपी’ कहा जा रहा है। हमारा इम्यून सिस्टम हमें कई बीमरियों से बचाता है, पर अंदर यह अपने ही ऊतकों के हमले से बचने के लिए एक सेफगार्ड भी बनाता है। कुछ कैंसर उन ‘ब्रेक्स’ का फायदा उठाकर हमले से बच सकते हैं। 70 के दशक में एलिसन और हॉन्जो ने ब्रेक लगाने वाले प्रोटीन को बंद कर ट्यूमर पर हमला करने वाले हमारे इम्यून सिस्टम को हटाने के लिए एक रास्ता ढूंढ़ निकाला। जिस बीमारी का पहले इलाज होना नामुमकिन था, उसके लिए नई दवाएं लाई गईं। इम्यून थैरेपी चेक पॉइंट का उपयोग एनएचएस द्वारा किया गया है, जिसका इस्तेमाल गंभीर मेलानोमा (त्वचा कैंसर) के इलाज के लिए किया जा रहा है।


इम्यूनोथैरेपी से एक नया रास्ता निकला है, जो अभी शुरुआती दौर में है, इसलिए भविष्य में इस दिशा में होने वाली प्रगति की कल्पना करना ही काफी रोमांचक है। ब्रिटेन में पहली बार एक नई मशीन का इस्तेमाल किया गया, जिससे डॉक्टर रेडियोथैरेपी करने के दौरान ट्यूमर की जांच भी कर सकते हैं। इससे कैंसर का ऐसा इलाज होने की उम्मीद बंधी है, जिसके साइड इफेक्ट कम होंगे।


ऐसे ही वैकल्पिक चिकित्सा के क्षेत्र में कई दशकों से काम करने वाली एक अग्रणी संस्था डीएस रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने खाद्य पदार्थो की पोषक ऊर्जा से कैंसर की औषधि तैयार की है, जिससे कई रोगियों में आशाजनक सुधार हुआ। हाल ही में इस औषधि का परीक्षण कोलकाता के जाधवपुर विश्वविद्यालय के सीआरसी नैदानिक अनुसंधान केंद्र ने भी किया। हालांकि यह दवा अभी बाजार में उपलब्ध नहीं है। डीएस रिसर्च सेंटर के जिन दो वैज्ञानिकों ने यह दवा विकसित की थी, वे भी जीवित नहीं हैं। पर उन्होंने इस सफलता की सूचना केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन को भेजी थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन को उन 926 रोगियों से संबंधित ब्योरे भी भेजे गए थे, जो कभी मस्तिष्क, अग्राशय, यकृत, रक्त्, गर्भाशय, स्तन कैंसर आदि से पीड़ित थे और अब सामान्य जिंदगी जी रहे हैं।

सेंटर के वैज्ञानिकों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से गुजारिश की थी कि यदि वह अपने स्रोतों से इसकी जांच-पड़ताल करा लेता अथवा दस-पंद्रह परिणामों को कैंसर पर विजय के रूप में प्रसारित कर देता, तो दुनिया भर के वैज्ञानिकों, चिकित्सकों तथा कैंसर रोगियों में आशा का संचार होता और कैंसर पर लगाम लगाने का मार्ग भी प्रशस्त होता।

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