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जीवन धारा: छलें नहीं, दुराव और कपट न करें; मूल्यों को सहेजें

महादेवी वर्मा, साहित्यकार Published by: ज्योति भास्कर Updated Fri, 07 Mar 2025 04:41 AM IST

सार

ईश्वर तो सर्वत्र है। उसे हमारे सत्य और असत्य से कोई मतलब नहीं। वह तो जानता ही है कि क्या सत्य है, क्या नहीं। वास्तव में समाज में एक-दूसरे के व्यवहार में सत्य की आवश्यकता है।
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छलें नहीं, दुराव और कपट न करें - फोटो : अमर उजाला / एजेंसी


वास्तव में समाज में एक-दूसरे के व्यवहार में सत्य की आवश्यकता है। हम छलें नहीं, हम दुराव न करें, हम कपट न करें। इससे समाज की स्थिति बनेगी। इसी तरह हमारे धर्म के मूल्य भी हैं और नैतिक मूल्य भी हैं। ईश्वर को हम दंड नहीं दे सकते। ईश्वर को क्षमा भी क्या हमारी चाहिए? मनुष्य को चाहिए। धी-बुद्धि-का विकास, विद्या का विकास, ये सत्कर्म जिन्हें हम धर्म कहते हैं, वे मानवीय मूल्य और नैतिक मूल्य भी हैं। दार्शनिक रूप से, सिद्धांत रूप से, मान्यता के रूप में ये नैतिक मूल्य हैं। जब ये नहीं रहेंगे, तो अनैतिक हो जाएंगे। अनैतिक मूल्य तो मानवीय मूल्य नहीं होते। ये दोनों हमें चाहिए। एक व्यवहार में चाहिए, एक धारणा में चाहिए।


आप देखेंगे कि जो बुरा व्यक्ति है, जैसे चोर-वह भी विश्वास करता है उसका, जो चोरी नहीं करता; और आप देखेंगे कि डकैत जो है, वह अपने को डकैत नहीं कहना चाहता। वह नहीं मानता कि वह बुरा काम कर रहा है। इसी तरह जो बहुत असत्य बोलता है, वह सत्यवादी का विश्वास करता है। मन में कहीं किसी कोने में मान्यता के प्रति हमारा सम्मान है। हम मानते हैं कि ये जीवन के मूल्य वास्तव में समाज के लिए आवश्यक हैं। नई परिस्थिति हर युग में आती है। इसीलिए कृष्ण कहते हैं, ‘संभवामि युगे युगे।’


हर युग में वही मूल्य रहते हैं, परंतु नए ढंग से उनकी परीक्षा होती है। वे मूल्य नहीं टूटते, जैसे अहिंसा नहीं टूटी है, सत्य नहीं टूटा है, कोई भी जीवन का क्षेत्र ऐसा नहीं है, जो जीवन को पूर्ण बनाता हो। आज हम चिंता करते हैं, क्योंकि हमारी पीढ़ी मूल्यों में विश्वास नहीं करती। मूल्यों का विश्वास खो देना बहुत बड़ा खो देना है। इसके संबंध में जितनी हम चिंता करें, उतना ही हम विकास कर पाएंगे। आज चिंता हमें इस बात की नहीं है कि कुछ व्यक्ति असत्य बोलते हैं। हमें चिंता है कि आज सत्य का मूल्य नहीं हुआ, अवमूल्यन हो गया है।


अब असत्य को ही जीवन का मूल्य मान लिया गया है। आज हमें एक नई नैतिकता चाहिए। ऐसी नैतिकता कि हम नए विज्ञान को संयोजित कर सकें, मनुष्य को कल्याण से मिला सकें। जब मनुष्य कल्याण से मिल जाएगा, तब वास्तव में हमारे मन का संकल्प भी मंगलमय हो जाएगा। तब नैतिक मूल्य तो हमारी आस्था में, विचार में रहेंगे; व्यवहार में हमारे मानवीय मूल्य रहेंगे; मनुष्य का मनुष्य के प्रति श्रद्धा-स्नेह-सौहार्द, परस्पर त्याग बलिदान हमारे आवश्यक गुण होंगे, बिना इसके मनुष्य जाति विकास नहीं करेगी।


सूत्र- मूल्यों को सहेजें                    

मूल्य परिवार में मिलते हैं, समाज में मिलते हैं, शिक्षा में मिलते हैं, आस्था में मिलते हैं। अनेक पीढि़यों की धरोहर हैं, ये मूल्य। इसलिए इनको सहेजने और आगे बढ़ाने का काम करें। क्योंकि मनुष्य का व्यक्तित्व जैसे बना है, ऐसे ही राष्ट्र का व्यक्तित्व बना है।
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