जादू की सवारी उतरी कि पता चलता है कि फैंसी चीजों की बहुतायत आराम में मददगार नहीं होतीं, बल्कि खलल ही डालती हैं। थोड़ी देर को स्वाभिमान को जरूर सेंक मिल जाता है, पर इससे अभिमान की गिल्टी को और खुराक ही मिलती है। जकड़ रेशमी डोरी की हो, तो रेशम के मुलायम स्पर्श के कारण क्या वह कम जकड़ होगी? पर, उस जादू की जकड़ से बचने का एक सीधा-सा उपाय है। वह यह कि बाजार जाओ, तो मन खाली न हो। मन खाली हो, तब बाजार न जाओ। कहते हैं लू में जाना हो, तो पानी पीकर जाना चाहिए।
पानी भीतर हो, लू का लू-पन व्यर्थ हो जाता है। मन लक्ष्य में भरा हो, तो बाजार भी फैला-का-फैला ही रह जाएगा। तब वह घाव बिल्कुल नहीं दे सकेगा, बल्कि कुछ आनंद ही देगा। तब बाजार तुमसे कृतार्थ होगा, क्योंकि तुम कुछ-न-कुछ सच्चा लाभ उसे दोगे। मन खाली नहीं रहना चाहिए, इसका मतलब यह नहीं है कि मन बंद रहना चाहिए। जो बंद हो जाएगा, वह शून्य हो जाएगा। शून्य होने का अधिकार बस परमात्मा का है, जो सनातन भाव से संपूर्ण है। इससे मन बंद नहीं रह सकता।
मन को बंद कर रखना जड़ता है। लोभ को जीतना यह नहीं है कि जहां लोभ होता है मन में, वहां नकार हो! यह तो लोभ की ही जीत है और आदमी की हार। आंख अपनी फोड़ डाली, तब लोभनीय के दर्शन से बचे, तो क्या हुआ? ऐसे क्या लोभ मिट जाएगा? और कौन कहता है कि आंख फूटने पर रूप दिखना बंद हो जाएगा? क्या आंखें बंद करके हम सपने नहीं देखते हैं? और वे सपने क्या चैन-भंग नहीं करते हैं? इससे मन को बंद कर डालने की कोशिश तो अच्छी नहीं।
ऐसे लोग बाजार का बाजारूपन बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि कपट बढ़ाते हैं। ऐसे बाजार मानवता के लिए विडंबना हैं और जो ऐसे बाजार का पोषण करता है, वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।