अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह संघर्ष रोका नहीं जा सकता था? क्या इसे पश्चिम एशिया में एक नए युद्ध की शुरुआत माना जाए? एक प्रश्न और, क्या यह समय युद्ध का है? स्पष्टतया नहीं, फिर भी दोनों देश युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं। अगर कुछ विदेशी, खासकर अमेरिकी अखबारों पर नजर डालें, तो कुछ दिन पहले से ही यह संकेत मिलने लगे थे कि इस्राइल ईरान पर हमला करने वाला है। अमेरिकी प्रशासन को नेतन्याहू की मंशा पता थी, इसके बावजूद हमला हुआ है, तो इसके निहितार्थ भी होंगे। वैसे नेतन्याहू अमेरिका से किसी निर्णय के लिए सलाह या अनुमति नहीं लेते, बल्कि उसे सूचना देते हैं, क्योंकि इस्राइल की सुरक्षा व सहयोग अमेरिका का दायित्व है। अमेरिका के पास इस्राइल का कोई विकल्प नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें, तो अमेरिका को यदि पश्चिम एशिया में अपने हितों की रक्षा करनी है, तो उसे इस्राइल का सहयोग करना ही होगा। सवाल उठता है कि वह संस्था कहां है, जिसे 1945 में वैश्विक शांति के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। संयुक्त राष्ट्र हमेशा गहरी नींद में दिखता है। शांति की पहल करने वाला अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी कहीं नहीं दिखता।
नेतन्याहू ‘ऑपरेशन राइजिंग लॉयन’ को उचित ठहरा रहे हैं, तो ईरान अपने ‘ऑपरशन ट्रू प्रॉमिस 3’ को। क्या यही 21वीं सदी की विशेषता होनी चाहिए? क्या अब समझौते और संधियों की कोई महत्ता नहीं रह गई? क्या यह बढ़ते कट्टर राष्ट्रवाद का परिणाम है या हथियारों के ढेर पर बैठी दुनिया का शगल है, जहां सब कुछ लड़ाई से हासिल होने का दंभ पाल लिया गया है? इस्राइल कह सकता है कि ईरान ने इतने बड़े पैमाने पर यूरेनियम संवर्धन कर लिया है कि उससे इस्राइल के लिए चिंताजनक हालात निर्मित हो गए हैं। इसलिए ईरान को रोकने के लिए कठोर कदम उठाना जरूरी था।
इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) ने अपने 12 जून के वक्तव्य में कहा कि ईरान अपने परमाणु अप्रसार दायित्वों का उल्लंघन कर रहा है। इसी आधार पर रैज जिमिट, जो इस्राइली खुफिया विश्लेषक और आईएनएसएस थिंक टैंक में ईरान कार्यक्रम के निदेशक हैं, ने यह निष्कर्ष निकाला कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम अब ‘क्रॉस रोड्स’ (चौराहे) पर पहुंच चुका है। इससे पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सैन्य परिवारों को वह क्षेत्र छोड़ने की अनुमति प्रदान की थी। इस अनुमति में यह तथ्य छिपा हुआ था कि वहां जल्द ही कुछ बड़ा होने वाला है। मसलन, बड़ा संघर्ष अथवा युद्ध। क्षेत्र के कई राजनयिकों ने अमेरिकी बलों की वापसी को वार्ता से पहले दबाव बनाने की एक रणनीति के रूप में देखा, न कि तत्काल किसी सैन्य कार्रवाई के संकेत के रूप में।
चूंकि, आईएईए भी यह मान चुकी है कि ईरान ने 60 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन में सफलता हासिल कर ली है, इसलिए वह परमाणु बम बनाने के बहुत करीब पहुंच गया है। ईरान की इस हैसियत को इस्राइल ही नहीं, बल्कि अमेरिका सहित पश्चिमी दुनिया भी स्वीकार नहीं कर पाएगी। यही नहीं, सुन्नी इस्लामी दुनिया भी यह स्वीकार नहीं कर पाएगी कि शिया नेता पश्चिम एशिया में परमाणु ताकत बन कर उभरे और उनके लिए खतरा बन जाए। इससे पहले भी ईरान परमाणु बम बनाने के करीब पहुंच गया था, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी सदस्य और ईरान के बीच जुलाई 2015 में ज्वाइंट कॉम्पि्रहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन पर हस्ताक्षर हुए (जिसे ईरान न्यूक्लियर डील भी कहा जाता है) और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अल्पविराम लगा दिया गया।
वर्ष 2018 में अमेरिका उस समझौते से बाहर हो गया। तब ट्रंप प्रशासन को लगा था कि ईरान घुटनों के बल आ जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि ईरान जल्द ही एक परमाणु समझौता करे, लेकिन इस्राइली हमले के बाद ईरान ने इन्कार कर दिया है। जो भी हो, अमेरिका धमकी और युद्ध जैसी युक्ति का इस्तेमाल करके ईरान को काबू में लाना चाहता है। क्या ईरान काबू में आ जाएगा? इसका उत्तर तभी मिल पाएगा, जब चीन और रूस अपने पत्ते खोलेंगे। इसलिए अभी बहुत कुछ छिपा हुआ है। जो भी हो, पश्चिम एशिया दुनिया का वह हिस्सा है, जहां वैश्विक शक्तियां प्रायः गेम खेलती रही हैं और उस गेम के नियम तय नहीं हैं।