अब मैं जनवरी के पहले हफ्ते में उन चीजों की सूची बनाती हूं, जिन्होंने मुझे बीते साल में सुखद अनुभव कराया। इसके लिए मैं अपने फोन की गैलरी में तस्वीरों का सहारा लेती हूं। इस आधार पर मैं वर्ष के संकल्पों की सूची बना लेती हूं। लेकिन इन्हें पूरा करने की टाइम-लाइन मैं कुछ यों बनाती हूं कि मुझे अपने लिए खाली वक्त मिलता रहे। हालांकि इस वर्ष मैंने कुछ अन्य लोगों से यह जानने की कोशिश की, कि संकल्पों को लेकर उनका नजरिया क्या है। मैंने सबसे पहले ‘10% हैप्पियर’ पॉडकास्ट के मेजबान और ध्यान के विशेषज्ञ डैन हैरिस से बात की।
उन्होंने मुझे बताया कि किसी भी संकल्प के पीछे छिपे ‘क्यों’ को समझना जरूरी है। वह कहते हैं, ‘अगर मैं ध्यान लगाता हूं या व्यायाम करता हूं, तो इसकी वजह यह है कि मैं औरों से अलग दिखना चाहता हूं।’ इसके बाद मैंने मेडिटेशन फॉर मॉर्टल्स के लेखक ओलिवर बुकरमैन से बात की। उन्होंने बताया, ‘अक्सर हम शुरुआत से ही बड़े बदलावों की उम्मीद करने लगते हैं और जब ऐसा नहीं होता, तो हम निराश होने लगते हैं।’ उनकी बातों से मुझे यह समझ आया कि शुरुआत खराब हो, फिर भी निराश होने की जरूरत नहीं, क्योंकि संकल्प पूरा करने के लिए आपके पास पूरा साल बाकी है।
नाइके रनिंग के ग्लोबल हेड कोच क्रिस बेनेट कहते हैं कि आश्चर्यजनक करने के बजाय ‘अपनी पहले की स्वस्थ आदतों को दोगुना करें और फिर उनका जश्न मनाएं’। बेनेट के अनुसार, सोने से पहले किताब पढ़ना और जगने पर तत्काल फोन न उठाने की आदतें भी अद्भुत हैं, इन्हें हल्के में न लें। कुल मिलाकर, मेरी समझ में जो आया, वह यह है कि नए साल को बदलाव का वक्त न मानें। जनवरी मौका देती है नए साल के आवेग को नजर अंदाज करने का और यह समझाने का कि जो चल रहा है, बस उसे ही जारी रखना होता है। यही तो जिंदगी है।