पिछले सप्ताह पहली जून को अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस मनाया गया। इस दिन ‘सेव द चिल्ड्रन’ नाम की संस्था ने 'स्टोलन चाइल्डहुड' यानी खोए बचपन नाम की एक रिपोर्ट पेश की, जिसे पढ़कर देश की सरकारों को शर्म से डूब जाना चाहिए। भारत में हम दशकों से 14 नवंबर को पंडित नेहरू की जन्मतिथि पर बाल दिवस मनाते आए हैं। प्रधानमंत्री नेहरू इस दिन दिल्ली में बच्चों से मिला करते थे। उनकी बेटी जब इस देश की प्रधानमंत्री बनीं, तो उन्होंने 1975 में आईसीडीएस नाम की योजना शुरू की, जो बच्चों के स्वास्थ्य विकास की विश्व की सबसे विशाल योजना मानी जाती है। और 2017 में देश के बच्चों का क्या हाल है? इतना बुरा कि म्यांमार, भूटान, श्रीलंका और मालदीव के बच्चे भारत के बच्चों से ज्यादा खुशनसीब होते हैं।
इस नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर दिन 3,200 बच्चे अपने पांचवें जन्मदिन से पहले ऐसी बीमारियों के कारण मर जाते हैं, जो अन्य देशों में जानलेवा नहीं हैं। देश के 38.7 फीसदी बच्चे अपने जीवन के पहले महीने में कुपोषित हो जाते हैं। इसकी वजह से 4.8 करोड़ बच्चों का कद नहीं बढ़ पाता। रिपोर्ट कहती है कि इस देश के 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं, जिनमें से 78 लाख इसलिए नहीं जाते, क्योंकि छोटी उम्र में ही उनको मजदूरी करनी पड़ती है। माना जाता है कि अपने भारत महान में बाल मजदूरों की संख्या 82.2 लाख है। इन बच्चों में सबसे बुरा हाल बेटियों का है, इसलिए कि 30 फीसदी बच्चियां 18 वर्ष तक पहुंचने से पहले ही ब्याह दी जाती हैं और छोटी उम्र में मां बन जाती हैं, जिसके कारण न उनकी सेहत अच्छी रहती है और न ही उनके बच्चों की।
यह आंकड़ा पढ़ने के बाद मैं शर्मिंदा हुई और मुझे गुस्सा भी आया, क्योंकि कुछ दोष हम पत्रकारों का भी है। किसी विकसित देश में ऐसी रिपोर्ट अखबार की सुर्खियां बनती। टीवी पर चर्चा होती और नौबत इस्तीफे मांगने की आ जाती। भारत में ऐसा नहीं होता है, क्योंकि हम पत्रकार ऐसी खबरों की अहमियत नहीं समझते। मैंने इसके बारे में सिर्फ एक अंग्रेजी अखबार में पढ़ा, वह भी अंदर के पन्ने पर।
दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में जब महामारियां फैलती हैं, तो इनकी जड़ें पाई जाती हैं उन झुग्गी बस्तियों में, जहां गरीब रहते हैं। मध्यवर्ग के और धनवान, दोनों के बच्चे इसका शिकार बनते हैं। पर चूंकि हम अपने बच्चों का इलाज करवाने की क्षमता रखते हैं, तो हम उन गरीबों की परवाह नहीं करते, जो लंबी बीमारियों में बेटियों का इलाज नहीं करवा सकते। गरीब भारतीय अपने बच्चों को सिर्फ सूखी रोटी और चाय दे सकते हैं। बस्तियों में आज भी स्वच्छ भारत का नामो-निशान नहीं दिखता। इसके लिए हम सब दोषी हैं। सबसे बड़ा दोष देश की सरकारों का है, जिन्होंने बच्चों के नाम पर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाईं, लेकिन इनमें भ्रष्टाचार के अवसर ज्यादा हैं और बच्चों को स्वस्थ रखने के कम।
इलाज साधारण और सस्ता भी है, जैसे अक्षयपात्र नाम की संस्था ने करके दिखाया है। बच्चों को दिन में एक वक्त का पोषण अगर भरपूर मिले, तो कुछ दिनों में ही बच्चों की सेहत और शिक्षा में परिवर्तन दिखता है। अक्षयपात्र को कृष्ण भक्त चलाते हैं, सो कई सेक्यूलर सरकारें उनको स्कूलों में दोपहर का भोजन संभालने का काम नहीं सौंपतीं। जिन राज्य सरकारों ने उनको यह काम सौंप रखा है, वहां बच्चों का जीवन इतनी जल्दी बेहतर हो जाता है कि जी खुश हो जाता है।