भारत में गिद्ध मंडरा रहे हैं। ये गिद्ध निवेशक हैं, जिनकी नजर डूब चुके कर्ज और संपत्तियों में अपने लिए अवसर तलाश रही है। वर्षों तक वे सुस्त कानूनी व्यवस्था और जटिल नौकरशाही के कारण भारत में निवेश से बचते रहे हैं। मगर हाल ही में अस्तित्व में आए नए दिवालिया कानून और भारतीय रिजर्व बैंक को डूबते कर्ज की वसूली के लिए दिए गए विशेष अधिकार ने घरेलू और विदेशी दोनों तरह के निवेशकों को उत्साहित कर दिया है, जिन्हें लग रहा है कि भारत का संकटग्रस्त बाजार उन्हें दो अंकों में रिटर्न दिला सकता है। मस्ट इन्वेस्टमेंट के संस्थापक सलीम सिद्धिकी कहते हैं कि नए दिवालिया कानून को सख्त बनाया गया है, जिससे भारतीय कर्ज बाजार विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक बन गया है। सिद्धिकी वाणिज्यिक कर्ज और निवेश के लिए एक भारतीय मर्चेंट बैंक की स्थापना कर रहे हैं।
हाल ही में दिल्ली स्थित एक प्राधिकरण ने एक इस्पात कंपनी इनोवेंटिव इंडस्ट्रीज की वह अपील खारिज कर दी, जिसमें यह कंपनी तर्क दे रही थी कि उसका जो कर्ज बकाया है, उस पर उसे पहले से मौजूद कानून के जरिये रियायत मिल सकती है। मगर प्राधिकरण ने अपने फैसले में देश के नए दिवालिया कानून का हवाला देते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। मुंबई स्थित एट केपिटल के एसेट मैनेजर रवि चाचड़ा कहते हैं कि आप देखेंगे कि अब बड़े कर्जदारों पर भी शिकंजा कसेगा।
रिजर्व बैंक के मुताबिक 30 सितंबर, 2016 तक भारतीय बैंकों का 105 अरब डॉलर का कर्ज बकाया था, जिसे गैर निष्पादित कर्ज कहा जाता है। ऐसे डूबत कर्ज में बियर और विमान कंपनी के विवादस्पद मालिक विजय माल्या का विभिन्न बैंकों का 1.3 अरब डॉलर का बकाया कर्ज भी शामिल है।
नए दिवालिया कानून का मकसद देश के पहाड़ जैसे हो गए कर्ज को खत्म करना और किसी कंपनी को भंग कर धन की वसूली को आसान बनाना है। भारत में कोई कंपनी वर्षों तक दिवालिया होने की आड़ ले सकती है, मगर नए कानून में दिवालिया होने की प्रक्रिया 180 दिन में पूरी करनी होगी। जे सी फ्लावर्स ऐंड कंपनी के मुख्य कार्यकारी जे क्रिस्टोफर फ्लावर्स के मुताबिक दिवालिया कानून को भारत के कर्ज बाजार को बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलेगी। इस कंपनी को रिजर्व बैंक ने भारतीय निवेश बैंक एंबिट के साथ मिलकर कर्ज से जुड़ी समस्याओं को निपटाने के लिए एसेट कंस्ट्रक्शन कंपनी बनाने की मंजूरी दी है। फ्लावर्स ऐंड कंपनी गोल्डमैन सैश की पूर्व सहयोगी कंपनी है और उसने करीब बीस वर्ष पूर्व जापानी बैंकों की हिस्सेदारी खरीदकर संपत्ति बनाई। फ्लावर्स मानते हैं कि भारत में कर्ज बाजार ठीक तरीके से काम नहीं कर रहा है, क्योंकि कर्जदाता अपने कर्ज की वसूली नहीं कर पाते और फिर यह कर्ज डूब जाता है। खराब कर्ज व्यवस्था पर बोझ बन गया है।
फ्लावर्स जैसे निवेशकों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, वह यह कि बैंक खराब संपत्तियों के एवज में निवेशकों को किसी तरह की रियायत देने को तैयार नहीं होते। क्रेडिट सुसी की रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2016 में सिर्फ तीन अरब डॉलर से कुछ अधिक मूल्य की गैर निष्पादित संपत्तियां ही एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियां खरीद सकीं। कुछ चर्चित सौदे अंजाम तक नहीं पहुंच सके। मसलन, सैन फ्रैंसिस्को की फरलौन केपिटल बदहाली से गुजर रही एस्सार स्टील के 24 फीसदी हिस्से का अधिग्रहण करना चाहती थी, मगर अब इसके आसार नहीं दिख रहे हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार पिछले वर्ष नवंबर में केंद्र सरकार के नोटबंदी के अप्रत्याशित कदम से सुस्त पड़ गई। कर चोरी रोकने और कालेधन पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने देश की 86 फीसदी मुद्रा को विमुद्रीकृत कर दिया था। इस कदम से नकदी की भारी कमी हो गई। यह आशंका जताई जा रही है कि देश की अर्थव्यवस्था को तब तक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जब तक यहां के बैंक भारी-भरकम खराब कर्ज के बोझ के तले दबे रहेंगे। मैकेंजी ऐंड कंपनी के भारत में वित्तीय सेवाओं के प्रमुख रेनी थॉमस कहते हैं कि सबसे अप्रिय बात यह है कि भारतीय बैंकों का कुल गैर निष्पादित कर्ज पूरी बैंकिंग व्यवस्था की कुल संपत्ति का बड़ा हिस्सा है।
अनेक विदेशी निवेशक यह मानते हैं कि नया दिवालिया कानून भारत के पूंजी बाजार तक उनकी पहुंच बना सकता है, जिसे इस तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था का ईंधन कहा जा सकता है। ऐतिहासिक रूप से भारतीय कंपनियां अपनी गतिविधियों को वित्तीय मदद पहुंचाने के लिए या तो अपनी हिस्सेदारी बेचती आई हैं या फिर बैंक से कर्ज लेती हैं। भारत में पूंजी बढ़ाने के लिए कॉरपोरेट बांड्स का सहारा कम ही लिया जाता है।
मस्ट इन्वेस्टमेंट के सिद्धिकी कहते हैं, 'भारत में कॉरपोरेट बांड्स के विकास के लिए न्याय प्रणाली, संसाधन, कानून और पारदर्शिता की जरूरत होगी। भारत अपनी गैर निष्पादित संपत्तियों की चुनौती से कैसे निपटता है, यह उसके लिए लिटमस टेस्ट जैसा है।'वास्तव में जे सी फ्लावर्स और अन्य विदेशी कंपनियां भारत के बदहाल कर्ज बाजार में हिस्सेदारी की योजना बना रही हैं। हालांकि अनेक कंपनियां अभी यह देखना चाहती हैं कि दिवालिया कानून वास्तव में कितना कारगर है।
वर्ष 2016 में आईसीआईसीआई ने इस कानून के तहत सबसे पहली बार इनोवेंटिव के खिलाफ दिवालिया होने की कार्रवाई शुरू की थी। इनोवेंटिव का तर्क था कि यह कंपनी महाराष्ट्र में स्थित है और इस राज्य के कानून के मुताबिक कंपनी का कर्ज एक वर्ष के लिए माफ कर दिया गया, इसलिए आईसीआईसी का दावा बेमतलब हो जाता है। सुनवाई के बाद नेशनल कंपनी लॉ ट्रिूब्यूनल, जोकि नए दिवालिया कानून के तहत सक्षम प्राधिकरण है, उसकी अपील खारिज कर दी। इस फैसले के बावजूद इस मामले ने दिखाया है कि आगे की राह बहुत आसान नहीं है।