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आईएएस बनने की चाहत

Thu, 02 Jul 2015 01:10 AM IST
सुरेंद्र कुमार
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भारत में सिविल सेवकों को खुद को लेकर अक्सर एक नकारात्मक छवि का सामना करना पड़ता है। चाहे वे किसी भी विभाग में काम क्यों न कर रहे हों, सामूहिक तौर पर उन्हें 'बाबू' होने का व्यंग्य झेलना ही पड़ता है। आखिर ये 'बाबू' हैं कौन? एक ऐसी कौम, जो 'यथास्थितिवाद' की घनघोर समर्थक है। जिन फैसलों को बदलने की उसमें ताकत नहीं, उन्हें लटका कर रखने में यह अपनी पूरी ताकत झोंक देती है। लीक से हटकर सोचने में पूरी तरह असक्षम और बात-बात पर नियमों का हवाला देने में सबसे आगे। पूरी तरह उदासीन और असंवेदनशील वर्ग, जिसकी नजर में लोग आंकड़ा भर हैं। खुद को साहब समझने वाला यह वर्ग मानता है कि सिर्फ उनके दम पर ही देश चल रहा है। सरकारें आती हैं, जाती हैं। पार्टियां चुनाव जीतती हैं, हारती हैं, मगर सत्ता की बागडोर जिसके भी हाथों में होती है, उसे इस वर्ग की जरूरत पड़ती है। ये विशेषज्ञ नहीं हैं। चाहे ग्रामीण विकास हो, या कानून, विज्ञान व तकनीक हो या पेट्रोलियम, यह वह सामान्यज्ञ वर्ग है, जो हर मंत्रालय का काम कर सकने में सक्षम है। इन सिविल सेवकों में भी सबसे ज्यादा आकर्षण है, आईएएस बाबू का। सिविल सेवकों के पदसोपान में यह सबसे ऊंची पायदान पर माने जाते हैं। यही वजह है कि आज भी ज्यादातर युवाओं का सपना आईएएस बनने का ही है।
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तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों, विदेशी बैंकों, दूरसंचार व आईटी कंपनियों के आने और आसानी से कंपनी खोलने की बढ़ती सहूलियत के बावजूद युवाओं में खासकर आईएएस को लेकर आकर्षण कम नहीं हुआ है। टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो, सिस्को, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों में हर महीने 95 हजार से साढ़े तीन लाख रुपये का वेतन पा रहे युवा नौकरी छोड़कर सिविल सेवाओं में किस्मत आजमाने आ रहे हैं, जिसका बेसिक वेतन छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद भी महज 40 हजार रुपये प्रति माह है।
पिछले दो महीनों के दौरान 530 से ज्यादा ऐसे युवाओं से मेरी बात हुई, जिन्हें आईएएस के इंटरव्यू का बुलावा आया हुआ था। मोटे तौर पर देखें, तो इनमें से 50 फीसदी ने आईआईटी से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की हुई थी। 30 फीसदी ऐसे थे, जो एमबीबीएस, एमएस या एमडी थे। केवल 20 फीसदी मानविकी पृष्ठभूमि के थे। दिलचस्प बात है कि इनमें से 90 फीसदी युवाओं ने वैकल्पिक विषय के तौर पर उन विषयों को नहीं चुना, जो उन्होंने स्नातक या परास्नातक स्तर पर पढ़े थे। इसके बजाय उन्होंने भूगोल, लोक प्रशासन, समाज शास्त्र, मनोविज्ञान जैसे उन विषयों को लिया, जिनकी सलाह शायद कोचिंग संस्थानों ने उन्हें दी थी। हैरत की बात है कि कई युवाओं ने साहित्य का विषय चुना, जिसे पहले उन्होंने कभी पढ़ा तक नहीं था। दरअसल, उन्हें सलाह दी गई थी, कि इन विषयों में ज्यादा अंक लाना आसान होता है। वर्तमान नियमों के मुताबिक अभ्यर्थी अपनी मातृभाषा, मसलन, गुजराती, मराठी इत्यादि में इंटरव्यू दे सकते हैं। इसके लिए यूपीएससी को दुभाषिए की व्यवस्था करनी होती है। हालांकि होता यह है कि ज्यादातर अभ्यर्थी हिंदी या अंग्रेजी या फिर मिली-जुली भाषा में ही इंटरव्यू देते हैं।
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जब उनसे पूछा जाता है कि आखिर आप आईएएस ही क्यों बनना चाहते हैं, तो ज्यादातर अभ्यर्थी कोचिंगों में सिखाया हुआ जवाब देते हैं। मसलन, यह एक बड़ा प्लेटफॉर्म है, समाज की सेवा करने, बदलाव के एजेंट बनने और करोड़ों भारतीयों की सेवा के ज्यादा अवसर इसमें मिलते हैं। उनसे यह पूछने पर, कि यह सब करने के अवसर तो एक इंजीनियर और डॉक्टर के तौर पर भी उन्हें मिल सकते हैं, ज्यादातर अभ्यर्थी हड़बड़ाते हुए कहते हैं कि खासकर आईएएस अधिकारी का पद कई तरह की जिम्मेदारियों को निभाने का मौका देता है। भारतीय विदेश सेवा में जाने की चाह रखने वाले अभ्यर्थी विभिन्न देशों की संस्कृतियों से परिचित होने और वैश्वीकृत दुनिया में देश का प्रतिनिधित्व करने के गौरव की बात करते हैं। अफसोस की बात है कि आईएफएस को लेकर युवाओं के आकर्षण में अब कमी आ रही है। जिन 500 से ज्यादा अभ्यर्थियों से मैं मिला, उनमें से केवल पांच ने आईएफएस को अपने पहले विकल्प के तौर पर चुना था। अधिकांश अभ्यर्थियों ने आईएएस और आईपीएस के विकल्प को आईएफएस पर प्राथमिकता दी थी। कई अभ्यर्थियों ने शुरुआत में आईएफएस को तीसरा विकल्प चुना था, मगर बाद में उसे बदलते हुए आईआरएस (आईटी) और आईआरएस (कस्टम्स ऐंड एक्साइज) को तरजीह दी। दरअसल, इससे वर्तमान पीढ़ी के अपने करियर से बदलती हुई उम्मीदों का पता चलता है।
आईटी कंपनियों से मोटी-मोटी तनख्वाह उठाने वाले सॉफ्टवेयर डिजाइनर अपने काम को लेकर एक तरह की ऊब की बात करते हैं। वे जानते हैं कि अपनी कंपनी के गेट के बाहर वे महज भीड़ का हिस्सा हैं। शायद इसीलिए वे अपने हाथों में सत्ता की ताकत का एहसास करने के लिए सिविल सेवा में आना चाहते हैं। इसके अलावा यह भी सच है कि मीडिया में सिविल सेवकों का कितना ही मजाक क्यों न बनाया जाए, मगर इन्हें मिलने वाली सामाजिक प्रतिष्ठा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं, उत्तर भारत के कुछ राज्यों में आईएएस दूल्हा पाने की कीमत दस करोड़ रुपये है। बिहार और उत्तर प्रदेश में तो अगर लड़का आईएएस की तैयारी भी कर रहा है, तो बाजार में उसका दाम बढ़ जाता है। यह देखते हुए समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि सिविल सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए कोचिंग उद्योग क्यों इतना फल-फूल रहा है? दरअसल, इंटरव्यू देने जा रहे अभ्यर्थी तनाव में होते हैं, और उन्हें लगता है कि कुछ मॉक इंटरव्यू देकर वे यूपीएससी के इंटरव्यू का सामना बेहतर ढंग से कर पाएंगे। मगर, मॉक इंटरव्यू के नाम पर वहां जो ड्रेस रिहर्सल होता है, उसे देखते हुए तो प्रार्थना ही की जा सकती है कि भगवान, आईएएस का इंटरव्यू देने वालों का भला करे।
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