वैसे तो यह मौसम बारिश का है, मानसून का है, मैचिंग के साथ कलरफुल छतरियों के तनने का है, मगर यह मौसम क्लीन चिट का भी है और धड़ल्ले से दी भी जा रही हैं। ऐसे मौसम में जब बंदा थोड़ा बहुत (अ)मानवीय होकर फिसलन भरे रास्तों पर चुपके से फिसल जाए और फिर फिसलते देख लिए जाने पर शर्मसार होने के बजाय क्लीन चिट से क्लीन होकर इतराने लगे, तब हर कोई आह भरकर यही कामना करेगा कि हाय, एक अदद क्लीन चिट उसके पास भी होती, तो उसकी सारी गंदगी क्लीन हो जाती।
सियासती प्रतिष्ठानों के पिछवाड़े जो गंदला परनाला बह रहा है, सब उसके घाट पर पैर डुबोए बैठे हैं और क्लीन चिट के क्लीनर से मैल छुड़ा रहे हैं। ऐसी क्लीन चिट से इतनी क्लीनता आती है कि दुश्मनों की आंखें तक चौंधिया जाती हैं। ऐसे में, जिन्हें क्लीन चिट नहीं मिल रही, उनके लिए मानसून का यह मौसम भी किसी सूखे से कम नहीं। क्लीन चिट की महत्ता को देखते हुए हर बंदे के जीवन में एक क्लीन चिट जरूर होनी चाहिए।
क्लीन चिट के अभाव में बंदा बड़ा बदरंग-सा फील कर सकता है। हर तरफ बदरंगियों की जमात है और उसमें हर कोई क्लीन चिट का तलबगार है। कुछ इसलिए बदरंगी होना चाहते हैं, ताकि क्लीन चिट हासिल कर सकें। क्लीन चिट मिल जाए, तो कोई कितना ही बदरंगी हो, उस पर आरोप, कीचड़ आदि ठहरते भी नहीं हैं। जब भी पोतने की कोशिश की जाती है, क्लीन चिट से आई चिकनाहट पर आरोप फिसलकर पोतने वालों को ही गंदा करने लगते हैं।
क्लीन चिट दरअसल उन्हीं के लिए हैं, जो कीचड़ में धंसे हैं या रंग डाले गए हैं। बाकी के लिए क्लीन चिट वैसे ही है, जैसे गंजों के लिए कंघे, बेसुरों के लिए सुर और नेताओं के लिए डिग्रियां। वैसे सरकार को एक क्लीन चिट परियोजना चलाकर सभी के लिए क्लीन चिट का इंतजाम करना चाहिए, ताकि क्लीन चिट पाने के लिए पहले वे दलदल में धंसकर बदरंग हो सकें। सब की अंतत: ख्वाहिश भी यही है।