उन्होंने कहा कि सरकार ने पिछले दरवाजे से रेल भाड़ा बढ़ा दिया। यह खाकसार तब से उस पिछले दरवाजे को ढूंढ रहा है। आखिर जो दरवाजा सरकार के इतने बड़े काम की चीज है, वह पीछे क्यों है, बंदे की उत्सुकता यही जानने में है। इस तलाश के दौरान मैं तमाम दूसरे दरवाजों और उप-दरवाजों से भी मिल आया, लेकिन जी वह ‘चमत्कारी’ पिछला दरवाजा नजर नहीं आया।
इस खोज के दौरान हालांकि मुझे तमाम अन्य छोटे-छोटे पिछले दरवाजों का भी सुराग मिला, जिनसे गुजरकर कई छुटभैय्ये नेताओं का राजनीति में भाग्योदय हुआ। लेकिन इन छोटे-छोटे दरवाजों की हैसियत इतनी नहीं दिख रही थी कि सरकार उनका इस्तेमाल अपने किसी बड़े फायदे के लिए करती। छोटे-छोटे दरवाजों के नाम ज्यादातर निजी उपलब्धियां ही दर्ज थीं।
वैसे विपक्ष का यह सवाल बड़ा बेचैन कर रहा है कि सरकार ने पिछले दरवाजे से रेल भाड़ा क्यों बढ़ाया। क्या सरकार के पास अगले दरवाजों की कमी हो गई है? या अगले दरवाजों पर सरकार को भरोसा नहीं रहा? वैसे इस सिलसिले में एक मत यह भी आ रहा है कि बड़े मौकों पर सरकार को अक्सर पिछला दरवाजा इस्तेमाल करना पड़ता है।
पिछला दरवाजा सरकार की सेहत और सुरक्षा, दोनों के लिए मुफीद माना जाता है, क्योंकि वह बेहद सुगम और सरल रास्ता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब यह पिछला दरवाजा सरकार की लाज बचाने टाइप बड़ी भूमिका निभाता है, तो सरकार इसके प्रमोशन इत्यादि के बारे में क्यों नहीं सोचती? इस पिछले दरवाजे को प्रमोट करके वह अगला दरवाज़ा क्यों नहीं बना देती? आखिर वक्त-बेवक्त सरकार अपने मिनिस्टरों को भी तो तरक्की देती रहती है।
विद्वानों का मत है कि इसमें बड़ा लोचा है। अगर पिछले दरवाजे को प्रमोशन दे दिया गया, तो सरकार संकट में घिर आएगी। वह अपने पांव पर कुल्हाड़ी क्यों मारेगी भला? सरकार की इसी मजबूरी ने पिछले दरवाजे को अगला दरवाजा न बन पाने के लिए अभिशप्त कर रखा है। लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है कि पिछला दरवाजा ही क्यों। विद्वानों का मत है कि चूंकि सरकार को कई दफा बड़े फैसलों पर कदम पीछे हटाने पड़ते हैं। इस प्रक्रिया को सरकार का बैकफुट पर जाना कहा जाता है। अपने फैसलों पर पीछे हटना और पिछले दरवाजे का इस्तेमाल ही सरकार को आगे ले जाता है।