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गुणवत्ता से मजबूत होगा लोकल

सुभाष गुप्ता Published by: संजीव कुमार झा Updated Fri, 26 Jun 2020 08:41 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई

वोकल फॉर लोकल महज एक नारा नहीं है। यह देश के उद्योग-धंधों को आगे बढ़ाने, रोजगार छूटने की आशंकाओं से सहमे लोगों और अर्थव्यवस्था को संभालने का ऐसा मंत्र है, जिसकी सार्थकता पर संदेह नहीं किया सकता। स्वदेशी को प्रोत्साहन देकर देश को आत्मनिर्भर बनाने की रणनीति में बापू के महान विचारों की महक भी समाहित है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वोकल फॉर लोकल का आह्वान करके देश को कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था पर आए संकट से उबारने की जो राह दिखाई है, उस पर चलना उतना आसान नजर नहीं आता। कुछ उद्योगपतियों की बेईमानी इस सुनहरे सपने को पूरा करने में बड़ी बाधा बनकर सामने आने लगी है।



कई कारणों से स्थानीय उद्योगों को आगे बढ़ाने की राह कभी आसान नहीं रही। पहला तो यह कि विदेशी उत्पादों के प्रति लोगों में एक अलग किस्म का आकर्षण रहा है। इसके अलावा बाजार की सोच भी स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा नहीं देती। उपभोक्ता पहले से ही ब्रांडेड उत्पाद लेना पसंद करते हैं। अक्सर व्यापारी भी उत्पादों की गुणवत्ता का उल्लेख करते हुए उत्पाद महंगे होने की उपभोक्ता की आपत्ति को यह कहकर खारिज कर देते हैं कि यह कम कीमत में मिलने वाला लोकल उत्पाद नहीं है। वर्षों से यही होता आ रहा है। स्थानीय उत्पाद भले ही बेहतर क्यों न हों, उपभोक्ता और बाजार उन्हें आसानी से मान्यता नहीं देते हैं।


प्रधानमंत्री ने कोरोना से उद्योग-धंधों, बाजार और अर्थव्यवस्था पर मंडराते खतरे को देखकर स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करने का आह्वान किया है, लेकिन उन्होंने घटिया उत्पादों की पैरोकारी कतई नहीं की है। स्थानीय उत्पाद बाजार में तभी पैर जमा सकते हैं, जब उनकी गुणवत्ता संदिग्ध न हो। उनका उपयोग करने के बाद उपभोक्ता पर उनकी छाप पड़नी ही चाहिए। किसी भी उत्पाद की छाप उसके प्रति मुखर लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता से ही पड़ सकती है।


उत्पाद की गुणवत्ता अच्छी है, तो उपभोक्ता कुछ अधिक कीमत चुकाकर भी उसे खरीदना पसंद करेगा। लेकिन गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हाल ही में उत्तराखंड के ऊधमसिंहनगर में स्थित आधा दर्जन कंपनियों के सैनिटाइजर के सैंपल फेल होना महज इसलिए चिंता का विषय नहीं है कि इन छह कारखानों ने घटिया सामग्री का उत्पादन करने का अपराध किया है, बल्कि यह मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इसने वोकल फॉर लोकल के उद्देश्य पर चोट की है।


कोरोना से बचाव के लिए बाजारों में सैनिटाइजर की मांग बहुत बढ़ गई है, ऐसे दौर में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुरूप उत्पादन करके उसे अपेक्षाकृत कम कीमत और ज्यादा गुणवत्ता के साथ बाजार में उतार कर भी मुनाफा कमाया जा सकता है। तमाम उत्पादक ऐसा कर भी रहे हैं, लेकिन ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए बेईमानी का सहारा लेने वालों ने सैनिटाइजर में मानकों के अनुरूप एल्कोहल न मिलाकर स्थानीय उत्पादों की साख बनाने की कोशिशों को धक्का पहुंचाया है। पिछले दिनों ऐसे छह कारखानों के सैनिटाइजर के सैंपल जांच में फेल हो जाने से इस गंभीर मामले का खुलासा हुआ।


प्रधानमंत्री के स्वदेशी पर जोर देने के बाद देश की प्रमुख कंपनियों ने अपनी रणनीति और अभियानों में स्थानीयता को महत्व देना शुरू कर दिया है। अनेक कंपनियां यही कर रही हैं। लेकिन बाजार में अपनी जगह न बना पाने वाली कंपनियों के लिए प्रधानमंत्री का आह्वान जहां नई राहें खोलने वाला है, वहीं कुछ कंपनियों की बेईमानी उनकी राह को और कठिन बना सकती है।


स्थानीय उत्पादों को महत्व देने के आह्वान के रूप में आत्मनिर्भरता का यह मंत्र उद्योग-धंधों और अर्थव्यवस्था के साथ ही पूरे देश को कोरोना से उपजे अंधकार और अनिश्चय की स्थिति से उबार सकता है। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय उत्पादों को स्थानीयता की महक से संवारा जाए और बेईमानी पर निगरानी के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित किया जाए, ताकि उपभोक्ताओं में स्थानीय उत्पादों के प्रति भरोसा पैदा हो।
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-लेखक पत्रकारिता के शिक्षक हैं।

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