जब भी भारत की स्वास्थ्य सेवाओं पर बहस होती है, तो वह अस्पतालों की संख्या, डॉक्टरों की कमी, महंगी दवाओं और अधूरे बीमा क्लेम के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन, एक ऐसा सवाल भी है, जो अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है। वह यह कि यदि किसी मरीज या उसके परिवार को लगता है कि इलाज के दौरान गंभीर चूक हुई है, तो क्या उसके पास सच जानने या फिर न्याय पाने का आसान रास्ता है?
हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें मरीज के परिजनों ने चिकित्सीय लापरवाही के आरोप लगाए। इन मामलों का सबसे चिंताजनक पहलू उसे साबित करने की कठिन प्रक्रिया भी है। कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी होती है कि सामान्य परिवार वर्षों तक चक्कर काटता रहता है। कई बार तो परिजन मुआवजे से ज्यादा यह जानना चाहते हैं कि आखिर उनके अपने के साथ हुआ क्या था?
इसका एक हालिया उदाहरण अलीगढ़ का है। महीने भर पहले राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने गलत किडनी निकालने के मामले में अलीगढ़ के एक नर्सिंग होम के डॉक्टर पर दो करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। पर, यह मामला वर्ष 2012 से चल रहा था। यानी, पीड़ित परिवार को अंतिम निर्णय तक पहुंचने में लगभग 14 वर्ष लग गए। यह घटना बताती है कि न्याय की राह कितनी लंबी और कठिन हो सकती है।
वर्ष 2025 में देशभर की विभिन्न अदालतों और एनसीडीआरसी में चिकित्सीय लापरवाही से जुड़े करीब 65 हजार मामले दर्ज हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें, तो भारत सहित पूरी दुनिया में हर साल असुरक्षित मेडिकल देखभाल के कारण अनुमानित 13.8 करोड़ मरीजों को नुकसान पहुंच रहा है।
भारत में मेडिकल लापरवाही से होने वाली मौतों या फिर गंभीर चोटों की जांच के लिए कोई खास संस्था भी नहीं है। कोई एजेंसी नहीं, जिसका एकमात्र काम यह पता लगाना हो कि असल में क्या हुआ था? आमतौर पर शिकायतें राज्य मेडिकल काउंसिल के जरिये भेजी जाती हैं। इनके फैसलों के खिलाफ राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) में अपील की जा सकती है, पर एनएमसी का मुख्य काम मेडिकल शिक्षा को विनियमित करना है। इसके अनुशासनात्मक बोर्ड के पास न तो कोई स्वतंत्र जांच करने वाले अधिकारी हैं और न ही अस्पतालों में जाकर सबूतों की जांच करने की कोई शक्ति। जांच और सुनवाई मंचों पर गलत जानकारी देने वालों के खिलाफ झूठी गवाही को लेकर कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान नहीं है। कुल मिलाकर, भारत में मरीजों और उनके परिवारों के लिए मेडिकल रिकॉर्ड तक समय पर पहुंच की गारंटी देने वाली कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है।
भारत में मरीजों के इलाज को लेकर दो बड़ी नीतिगत कमियां हैं। इनमें से एक तो नेशनल इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड (ईएमआर) सिस्टम का न होना और दूसरा लैब को सीधे कंसल्टिंग डॉक्टर से जोड़ने वाले डिजिटल सिस्टम के अभाव का होना है। भारत में एक स्वतंत्र और वैधानिक संस्था होनी चाहिए, जो मरीजों की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामलों, खासकर मौत, स्थायी विकलांगता या गंभीर चोट की घटनाओं की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच करे। इलाज से जुड़े दस्तावेज समय पर उपलब्ध हों, मेडिकल रिकॉर्ड डिजिटल रूप में सुरक्षित रखे जाएं और शिकायतों की निष्पक्ष जांच की व्यवस्था हो, यह सुनिश्चित करना जरूरी है।
यह भी सही है कि हर मरीज की मौत या इलाज का असफल होना लापरवाही नहीं होता। डॉक्टरों को कई बार कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने पड़ते हैं। उन्हें भी ऐसे माहौल की जरूरत है, जहां वे बेवजह के मुकदमों के डर के बिना काम कर सकें। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि मरीजों और उनके परिवारों को जानकारी और न्याय का अधिकार न मिले।
किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसा केवल बड़े अस्पतालों और आधुनिक मशीनों से नहीं बनता। भरोसा तब बनता है, जब मरीज को लगे कि उसकी बात सुनी जाएगी और किसी विवाद की निष्पक्ष जांच होगी। इलाज का अधिकार जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है सच जानने का अधिकार भी। भारत को ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें डॉक्टर और मरीज एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साझेदार हों। बेहतर इलाज के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। अगर मरीजों को अपने अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़े, तो यह चिंता का विषय है। एक संवेदनशील समाज की पहचान यही है कि मरीज को इलाज के साथ न्याय और सम्मान भी मिले।