पाकिस्तान की जेल में सरबजीत की हत्या से वहां भारतीयों, खासकर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर उभरकर सामने आया है। किसी भी देश या क्षेत्र में सभ्यता के विकास का एक बड़ा पैमाना यह है कि वहां अल्पसंख्यकों के साथ समता और न्याय का व्यवहार होता है या नहीं।
इस आधार पर दक्षिण एशिया को परखा जाए, तो इस पूरे क्षेत्र की ही स्थिति चिंताजनक लगती है। मसलन, अपने देश में अनेक निर्दोष मुसलिम युवाओं को अनुचित मुकदमों में फंसाया गया है। श्रीलंका में तमिल समुदाय से कई स्तरों पर घोर अन्याय हो रहा है। भूटान में नेपाली भाषी अनेक अल्पसंख्यक विस्थापित हो चुके हैं। पर इन सबमें पाकिस्तान की स्थिति तो सबसे खतरनाक है।
पाकिस्तान में कट्टरवादी हिंसक संगठनों को देशी-विदेशी स्तर पर आर्थिक मदद और समर्थन मिलता रहा है, जिस कारण वे ताकतवर हो गए हैं। अन्य धर्मों के प्रति वे असहिष्णुता की नीति अपनाते हैं, जो हिंसक रूप ले लेती है। सामान्य समय में भी इन तत्वों के प्रभावी होने और इनकी सोच के हावी होने के कारण धार्मिक स्तर पर अल्पसंख्यकों को अन्याय सहना पड़ता है।
हाल के समय में वहां ईसाई समुदाय के लोगों को कट्टरवादियों के कई हिंसक हमले सहने पड़े हैं। विगत नौ मार्च को लाहौर में ही जोजफ कॉलोनी पर कट्टरवादी युवाओं ने भीषण हमला किया था, जिसमें अनेक ईसाइयों के घर जला दिए गए थे। कहा यह जाता है कि भू माफिया ने शहर की मूल्यवान जमीन हथियाने के लिए कट्टरवादी तत्वों से वह हमला करवाया। इससे पहले भी जमीन हथियाने के लिए कट्टरवादी तत्वों को सामने कर ईसाइयों या अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले करवाए गए हैं।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों (मुख्य रूप से हिंदू, सिख एवं ईसाई) का प्रतिशत वहां की जनसंख्या में जिस तेजी से कम हुआ है, वह गहरी चिंता और जांच का विषय है। पाकिस्तान बनने के समय वहां अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय कुल जनसंख्या के 23 प्रतिशत के आसपास थे। लेकिन अब यह आंकड़ा महज तीन प्रतिशत के लगभग रह गया है। ऐसे में जरूरी यह है कि निष्पक्ष मानवाधिकार संगठन विस्तार से जांच कर यह तथ्य दुनिया के सामने रखें कि अन्याय और हिंसा के कारण कितने अल्पसंख्यकों को देश छोड़ना पड़ा और कितनों को धर्म-परिवर्तन करना पड़ा।
स्थिति यह है कि वहां कट्टरपंथियों ने मुसलमानों के बीच के विभिन्न समुदायों को भी चुन-चुनकर अधार्मिक घोषित किया है और उनके विरुद्ध हिंसा की है। ऐसे कुछ कट्टरपंथियों ने पहले अहमदिया समुदाय को अपना निशाना बनाया, उसके बाद शिया समुदाय को।
कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने हाल के वर्षों में शिया समुदाय पर बार-बार हमले किए हैं। ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जब बस यात्रियों को रोककर उनमें से शिया समुदाय की पहचान कर उनकी हत्या कर दी गई। यह हाल तब है, जब पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं शिया थे।
चूंकि इस संदर्भ में भारत से उठने वाली आवाज को पाकिस्तान पक्षपातपूर्ण मानेगा, अतः जरूरी है कि अंतराष्ट्रीय जांच दल पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों पर निष्पक्ष जांच रिपोर्ट तैयार करे। वैसे पाकिस्तान के अपने मानवाधिकार संगठन और आयोग ने भी इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण काम पहले किए हैं।
भारत में पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं की भारत की नागरिकता की मांग को पाकिस्तान में उनकी बढ़ती असुरक्षा के संदर्भ में समझना चाहिए। इसमें कई पेचीदगियां और कठिनाइयां हो सकती हैं, फिर भी यथासंभव इस पर सहानुभूति से विचार होना चाहिए।
चूंकि पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार के नए मुखिया नवाज शरीफ की छवि भारत-हितैषी की है, ऐसे में यह उम्मीद करनी चाहिए कि वह दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्ता कायम करते हुए वहां अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने के बारे में भी व्यापक रूप से सोचेंगे। पिछले दिनों पाकिस्तानी हिंदुओं का एक बड़ा जत्था भारत आया, जो अब सीमा पार लौटने के लिए तैयार नहीं है। हिंदुओं के अलावा दूसरे अल्पसंख्यक भी शोषण के शिकार हैं। पाकिस्तान की नई सरकार को इस दिशा में कुछ ठोस काम करना ही होगा।