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उनका कोई विकल्प नहीं है

Thu, 16 May 2013 09:04 PM IST
उर्मिलेश
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संप्रग के बीते चार साल के दौरान पार्टी को कई बार यह कहने की औपचारिकता निभानी पड़ी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच कोई मतभेद नहीं हैं। ये बातें तभी कही जाती हैं, जब कुछ खास कारणों से मतभेद सामने आ जाते हैं।
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लेकिन सरकार और पार्टी के कामकाज की शैली पर नजर रखने वालों को अच्छी तरह मालूम है कि शासन से जुड़े ज्यादातर मामलों में प्रधानमंत्री यूपीए अध्यक्ष से आए हर संदेश और संकेत का सरकारी नीति-निर्धारण में पालन करते हैं। आर्थिक नीतियों और विदेश नीति के मामले में प्रधानमंत्री की हर बात को 10, जनपथ की हरी झंडी होती है। जबकि घरेलू मामलों और बड़ी नियुक्तियों सहित सरकारी फैसलों के क्रियान्वयन में 10, जनपथ की बात सर्वोपरि होती है।

आजादी के बाद के कांग्रेसी इतिहास और कामकाजी संस्कृति के हिसाब से देखें, तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के रिश्ते निस्संदेह बेहतर माने जाएंगे। इनमें जटिलता और टकराव के बिंदु बहुत ज्यादा नहीं दिखे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है-मनमोहन सिंह का बुनियादी तौर पर एक सधा हुआ नौकरशाह होना, जिनका अतीत राजनीतिक नहीं है।
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यही वह कारण है कि प्रणब मुखर्जी, दिवंगत अर्जुन सिंह, शीला दीक्षित या कांग्रेस का कोई और नेता प्रधानमंत्री पद के लिए 10, जनपथ की पसंद नहीं बना। वर्ष 2004 के चुनाव के बाद जब गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने से सोनिया गांधी ने इनकार किया, तो उनके सामने विकल्प सिर्फ मनमोहन सिंह थे। अगर आज यूपीए के कांग्रेसी-संकट का एक वजह स्वयं मनमोहन सिंह हैं, तो संकट से उबारने वाले भी स्वयं मनमोहन सिंह हैं। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस की यह मनमोहन-माया है।

यह कोई आज की परिघटना नहीं है। पिछली शताब्दी के सातवें दशक से ही ‘कांग्रेसी’ नामक राजनीतिक जीव आम तौर पर नेहरू-गांधी परिवार की छांव के बगैर सियासत करने की बात नहीं सोच सकता। जो ऐसा सोचने की धृष्टता करता है, वह बाहर हो जाता है या कर दिया जाता है।

कांग्रेस ऐसी पार्टी है, जिसमें नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति की राजनीतिक या वैयक्तिक श्रेष्ठता को स्वीकार करना पार्टीजनों के स्वभाव में नहीं है। ऐसे में कांग्रेस के धुर विरोधियों को भी मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नौ साल से जारी कामकाजी रिश्तों की निरंतरता की दाद देनी होगी।

10, जनपथ कुछ कहे या न कहे, उससे पहले कांग्रेसियों की छोटी-बड़ी टुकड़ियां समय-समय पर मनमोहन सिंह और उनके कामकाज पर तल्ख टिप्पणियां करती रहती हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि प्रधानमंत्री ऐसा कुछ भी नहीं करते, जिसकी 10, जनपथ से पहले से मंजूरी न हो। सच्चाई यह है कि आर्थिक और वैदेशिक मामलों के नीति-निर्धारण में आम तौर पर डॉ. सिंह की बीते नौ वर्षों से सर्वोच्च भूमिका रही है।

10, जनपथ के पारिवारिक या राजनीतिक सलाहकार और अन्य पार्टी नेता चाहे जो कहें, कांग्रेस अध्यक्ष (और अब उपाध्यक्ष भी) ने पार्टी में किसी को भी मनमोहन सिंह के विकल्प के तौर पर नहीं देखा। कांग्रेस अध्यक्ष चाहें, तो भी अगले संसदीय चुनाव से पहले नेतृत्व-परिवर्तन के लिए पार्टी में एक तरह की विकल्पहीनता है। पी चिदंबरम, ए. के एंटनी, शीला दीक्षित या इस तरह के जितने नाम लें, ये सभी राजनीतिक-समुदाय से आते हैं।

इन सबकी निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और एजेंडे हो सकते हैं। एंटनी इनमें ज्यादा भरोसेमंद जरूर हैं, पर मनमोहन सिंह का विकल्प बनने के रास्ते में उनका केरल के एक खास समुदाय से आना सबसे बड़ी बाधा है। वैसे में विपक्ष, खासकर भाजपा की तरफ से कांग्रेस अध्यक्ष पर बेवजह आरोप लगने शुरू हो जाएंगे।

कांग्रेस में ऐसा और कौन है, जिसकी विवादों से इतर राजनीतिक या व्यक्तिगत तौर पर एक देशव्यापी छवि हो, जो कांग्रेस अध्यक्ष का भरोसेमंद हो और नेहरू-गांधी परिवार के सत्ता-संकेंद्रण एजेंडे और राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के भावी एजेंडे के लिए भी अनुकूल हो!

मनमोहन सिंह के नौ साल के कार्यकाल में कांग्रेस के अंदर के उनके विरोधी उन पर सबसे बड़ा आरोप लगाते हैं कि सत्ता-शीर्ष पर पहुंचने के बाद उन्होंने भी अपना एक गुट बना लिया! पर उनके गुट में जिनके नाम लिए जाते हैं, वे सब नौकरशाह हैं, नीति-निर्धारक निकायों के प्रशासक हैं या लगभग गैर-राजनीतिक किस्म के कांग्रेसी हैं।

मसलन, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, इस्सर अहलूवालिया, टी के नायर या अश्विनी कुमार जैसे लोग। 10, जनपथ को इसीलिए मनमोहन सिंह बेहद पसंद हैं। हाल के घपलों-घटनाक्रमों से सरकार की छवि जरूर गिरी है। पार्टी की भावी चुनावी संभावनाओं पर इसका बुरा असर पड़ा है। पर क्या ठिकाना, मनमोहन सिंह की जगह कोई दूसरा होता, तो 10, जनपथ के सामने और ज्यादा मुश्किलें आतीं!

इसीलिए राहुल गांधी के सत्तारोहण से पहले कांग्रेस-नीत किसी गठबंधन सरकार में फिलहाल मनमोहन सिंह का कोई विकल्प नहीं दिखता। राहुल अगले संसदीय चुनाव से पहले नेतृत्व में आने की कांग्रेसियों की अपील कई बार खारिज कर चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस और राहुल, दोनों को इंतजार करना होगा।

आरोपों, विवादों और विफलताओं की चाहे जितनी बौछार हो, जब तक कोई सांविधानिक अड़चन नहीं पैदा होती, मौजूदा सत्ता-समीकरण में मनमोहन सिंह ही ‘किंग’ बने रहेंगे। विगत 15 मई को असम से एक बार फिर राज्यसभा के लिए अपनी उम्मीदवारी का पर्चा वह भर भी चुके हैं।
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