देश का सामूहिक आचरण बदल रहा है। यदि कुछ वर्ष पूर्व से ही तुलना की जाए, तो किसी मुद्दे या किसी घटना पर लोगों की प्रतिक्रियाओं में आमूल बदलाव दिखेगा। बर्बर सामूहिक दुष्कर्म के बाद जो जनज्वार उभरा, उसकी क्या हम कुछ समय पूर्व कल्पना भी कर सकते थे?
पहले घटनाएं सामूहिक घुटन का कारण बनती थीं। लोगों की प्रतिक्रियाएं निराशाजनक होती थीं। वे कहते थे कि अब कुछ बदलाव नहीं हो सकता। यह स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। लोग जिस ढंग से सड़कों पर उतरे और डटे रहे, सरकार के आश्वासनों के बजाय ठोस प्रतिफल के लिए नए वर्ष के जश्न तक को तिलांजलि दे दी और किसी परिस्थिति में आपा नहीं खोया, वह सब अभूतपूर्व है।
केवल इसी घटना पर नहीं, आप 2011 से आरंभ अन्ना अभियान या स्वामी रामदेव के अभियान को देखें, तो दृश्य थोड़े-बहुत अंतर के साथ ऐसा ही दिखेगा। यह हर दृष्टि से हमें बदले हुए भारत का एहसास करा रहा है। ऐसे भारत का जिसमें संवेदना भी है, स्पंदन भी और समाज की बेहतरी के लिए निजी सुख को किसी हद तक लात मारने और कष्ट उठाने का संकल्प भी।
हमारा देश जिन भयावह संकटों में धंसता गया है, उससे उबरने की आकांक्षा रखने वालों के लिए बदलाव के ये दृश्य उत्साहजनक हो सकते हैं। आखिर कौन सोच सकता था कि आर्थिक उदारीकरण से उभरी जीवन-शैली में मदमस्त रहने वाला समाज पहली जनवरी के आगमन के जश्न में सराबोर नहीं होगा। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में भी पटाखों की कानफोड़ू ध्वनि गायब थी और बड़े-बड़े होटलों एवं रेस्तराओं तक ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम रद्द किए। जंतर-मंतर पर डटा समूह वहां बना रहा। यह बदलाव की आहट नहीं, तो और क्या है?
वास्तव में आजादी के बाद जिन संगठनों पर भारतीय समाज को जागृत कर औपनिवेशिक अवशेषों से अलग वास्तविक भारत के पुनर्निर्माण के लिए अभियान-आंदोलन चलाने की जिम्मेदारी थी, वे आज हाशिये पर हैं। गांधी जी ने तो कहा ही था कि आजादी के संघर्ष से ज्यादा सघन संघर्ष और परिश्रम भारत की सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक आजादी के लिए करना होगा।
इसी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप भारत का पुनर्निर्माण कर इसे विश्व का सिरमौर राष्ट्र बनाने को अपना लक्ष्य घोषित करता था। एक धारा और कई उपधाराएं समाजवादियों की हैं, जिनका लक्ष्य भी राष्ट्र-राज्य के ढांचे को समतामूलक बनाना था। कम्युनिस्टों की बिखरी हुई, पर अपनी धाराएं और उपधाराएं तो रही ही हैं।
कहां हैं ये संगठन? गांधी जी अकेले व्यक्ति थे, जिन्होंने आजादी के बाद की पुनर्रचना का संपूर्ण विकल्प दिया कि कैसे आम आदमी को परिवर्तन का वाहक बनाएं और परिवर्तन के लिए रचना तथा संघर्ष, दोनों मोर्चों पर कैसे काम करें। लेकिन आज विद्रोह के दिशाहीन होकर अराजक और बिखरने के खतरे को अगर टालने की स्थिति नहीं है, तो फिर इससे बड़ी त्रासदी भारत के लिए क्या हो सकती है!
संघ परिवार चाहे अपने बारे में जो भी दावा करे, उसके स्वयंसेवक एवं कार्यकर्ता भले ऐसे अभियानों में सक्रिय रहते हों, पर संगठन के स्तर पर देश में उभरे जनाक्रोश और विद्रोह को दिशा देकर उसे परिवर्तन के लक्ष्य तक जाने के लिए जरूरी दीर्घकालीन अभियान का न केवल अभाव दिखता है, बल्कि क्षमता भी नहीं है। इन तीनों धाराओं में भिन्नता है, और यह राजनीतिक या दलीय ज्यादा है, फिर भी मान लेते हैं कि इनमें एका नहीं हो पाता।
इनमें से कोई एक धारा जो सर्वस्वीकृत हो सकती थी, वह है गांधी के विचारों की धारा। संघ और समाजवाद दोनों धाराओं से उसे सहयोग मिल सकता था। इस समय सबसे ज्यादा आवश्यकता उसकी ही थी, जिससे भारत और विश्व के लिए भी भविष्य के निर्माण की दिशा सामने आती।
तो क्या यह मान लें कि जो बदला हुआ भारत दिख रहा है, वह वाकई इन संगठनों की अनुपस्थिति के कारण समय की मांग के अनुरूप रूपाकार और दिशा ग्रहण नहीं कर पाएगा? या सही दिशा के अभाव में उसका जो समुच्चय प्रकट होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है।