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भाषायी रंगभेद जिसे दुनिया न माने

Sun, 03 Aug 2014 06:54 PM IST
योगेंद्र यादव
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दुनिया में दो तरह की विषमताएं होती हैं। पहली को खुली आंख से देख सकते हैं। दूसरी विषमता खुली आंखों से नहीं दिखाई देती। रंगभेद के साथ कुछ ऐसा ही होता है। हम भारतीय गर्व से कहते थे कि देखो! हमारे यहां रंगभेद नहीं है। लेकिन, हमारे यहां एक गहरा भाषा-भेद है, जो विषमता को व्यक्त करता है। हम भाषायी-विभेद की दुनिया में जीते हैं और यह हमें खुली आंखों से नहीं दिखाई देता।
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‘तीस दिन में अंग्रेजी बोलना सीखिए’ सरीखे विज्ञापन, कुकुरमुत्ते की तरह उगते अंग्रेजी मीडियम के स्कूल, गप-गोष्ठियों से लेकर सभा-सेमिनारों तक में एक दूसरे को अपनी लंगड़ी अंग्रेजी से प्रभावित करने की कोशिश में लगे लोग, बच्चों के अंग्रेजी में तुतलाने, फिर उनके साथ खुद भी अंग्रेजी में तुतलाते मां-बाप...यह दृश्य हमारे लिए जाना-पहचाना है। भारतीय भाषाओं को हीन समझा जाता है, और इसी तर्क से उन लोगों को भी हीन माना जाता है, जो इन भाषाओं में लिखते-पढ़ते और बोलते हैं। यूपीएससी की सिविल सर्विस परीक्षा के सी-सैट पर्चे को लेकर उठे विवाद के मूल में भी यही बात है।

विरोध एप्टीट्यूड टेस्ट को लेकर कतई नहीं है। किसी नौकरी के लिए कोई उम्मीदवार कितना उपयुक्त है-इसे जांचने के लिए पूरी दुनिया में एप्टीट्यूड टेस्ट का उपयोग एक मानक के रूप में किया जाता है। ठीक इसी तरह मानविकी बनाम विज्ञान के विवाद में कुछ दम तो है जरूर, पर यह भी मुद्दे की मुख्य बात नहीं है। यह सच है कि जो छात्र इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई से जुड़े हैं, वे बाकियों की तुलना में इधर कई वर्षों से सिविल सर्विस परीक्षा में अच्छा रिजल्ट ला रहे हैं। हो सकता है, ऐसे उम्मीदवार जिस तरह के परीक्षा पैटर्न से परिचित हैं, वह सिविल सर्विस परीक्षा को पार करने के मामले में उनके लिए तनिक मददगार साबित होता हो।
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सी-सैट को लेकर उमड़ा विरोध न हिंदी की तरफदारी में है, न अंग्रेजी की मुखालफत में, बल्कि उनका संघर्ष सभी भारतीय भाषाओं का पक्षधर है। प्रदर्शनकारियों ने बार-बार कहा है कि वे अंग्रेजी के विरोध में नहीं हैं। अंग्रेजी मीडिया यह बात समझ ही नहीं पा रहा कि हिंदी-हिमायती या अंग्रेजी-विरोधी हुए बगैर भी कोई भाषायी गैर-बराबरी का सवाल उठा सकता है। यह विरोध-प्रदर्शन अंग्रेजी के दबदबे के खिलाफ है। राष्ट्र की सारी प्रतिभा अंग्रेजीभाषी एक छोटे-से समूह के अंदर ही विराजती है-यह विरोध इस धारणा के खिलाफ है। यह हिंदी की हिमायत की नहीं, बल्कि अंग्रेजी के बरक्स बाकी भारतीय भाषाओं को होड़ के लिए बराबर की जमीन दिलाने की एक गंभीर लड़ाई है।

बात यह है कि सी-सैट बड़े चुप्पा ढंग से अंग्रेजी को बरतर बनाता है। एप्टीट्यूड टेस्ट के भीतर निश्चित ही भाषायी योग्यता-क्षमता की जांच होनी चाहिए, पर क्या इसका भी कोई तुक है कि यह जांच सिर्फ अंग्रेजी भाषा में होनी चाहिए। सी-सैट में फिलहाल यही व्यवस्था है। यह अलग है कि भाषायी योग्यता की जांच के लिए पूछी जाने वाली अंग्रेजी दसवीं-बारहवीं के स्तर की होती है। यहां मुद्दे की बात यही है कि भाषायी योग्यता की जांच के लिए किसी भारतीय भाषा पर विचार तक नहीं किया गया है। सी-सैट के प्रश्नपत्र में प्रस्तुत अनुवाद को लेकर उठा हंगामा बेजा नहीं है। इससे साबित होता है कि एप्टीट्यूड की जांच भाषा-निरपेक्ष नहीं है।

प्रदर्शनकारी ठीक ही नाराज हैं कि उनके साथ सिविल सेवा की परीक्षा में दोयम दर्जे का बर्ताव किया जा रहा है। आंकड़े इस आशंका को पुष्ट करते हैं। साल 2013 के पुख्ता आंकड़े अभी नहीं आए हैं, तो भी खबरों के मुताबिक, सिविल सेवा परीक्षा में अंतिम रूप से चयनित कुल प्रतिभागियों में हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों की संख्या 2011 (इस साल सी-सैट की परीक्षा शुरू हुई) के बाद से घटकर महज तीन प्रतिशत रह गई है, जबकि 2009 में यह संख्या 25 प्रतिशत थी।

सी-सैट का पर्चा या फिर सिविल सेवा परीक्षा तो एक बड़ी सच्चाई का सिरा भर है। उच्च शिक्षा की पूरी प्रणाली भारतीय भाषाओं को पढ़ाई और परीक्षा का माध्यम बनाकर स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले विद्यार्थियों के विरोध में खड़ी है। देश में उच्च अध्ययन के नामी-गिरामी संस्थानों में प्रवेश के लिए उन्हें आनन-फानन में अंग्रेजी अपनाना पड़ता है। समाज विज्ञान और मानविकी के विषयों की पढ़ाई वाले छात्रों के लिए यह कोशिश कुछ इतनी कठिन साबित होती है कि बहुधा छात्र इस आजमाइश में ही नहीं पड़ते।

यदि संस्थान एक या एक से अधिक भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने की अनुमति देने वाला हुआ, तो भी हर कदम पर बाधाएं खड़ी मिलती हैं : पाठ्यक्रम और उनमें दर्ज जरूरी किताबें अंग्रेजी में होती हैं, प्रश्नपत्र भले ‘ज्ञानी गूगल जी’ के सहारे अन्य भाषाओं में अनूदित करवा लिया जाए, लेकिन शायद ही कोई परीक्षक इन भारतीय भाषाओं का जानकार मिलता है। भारतीय भाषा को पढ़ाई का माध्यम बनाने वाले छात्र अपेक्षाकृत कमतर माने जाने वाले संस्थानों में दाखिला ले पाते हैं या फिर बेहतर संस्थानों के भीतर कमतर दर्जे के अकादमिक पद हासिल कर पाते हैं। उन्हें हर वक्त धारा के विरुद्ध तैरना पड़ता है।

इसी वजह से मैं इस विरोध-प्रदर्शन को देखकर खुश हूं और इसे सलाम भेजता हूं। विरोध-प्रदर्शन अगर मुख्य मुद्दे से न भटके, अभ्यर्थियों को सिविल सेवा परीक्षा देने का एक और अतिरिक्त मौका देने जैसे फुसलावनों या फिर सत्ताधारी पार्टी और उसके एजेंटों के फांस-फंदों में न उलझे, तो छात्रों का यह विरोध-प्रदर्शन देसी भाषाओं के खिलाफ जारी रंगभेदी बर्ताव के असर को एक हद तक कम करने की दिशा में बढ़ा कदम साबित हो सकता है। और हां, एक बात यह भी कि ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते!
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(लेखक आम आदमी पार्टी के राजनीतिक मामलों की शीर्ष समिति के सदस्य हैं)
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