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बेटियों को खेलने दो

Tue, 16 Aug 2016 07:20 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
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नीलांजन मुखोपाध्याय
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ज्यादातर अखबारों का मानना है कि दीपा करमाकर ने लाखों भारतीयों का दिल जीत लिया, हालांकि मामूली अंतर से वह ओलंपिक में पदक पाने से विफल रही। खेल स्तंभ के लेखकों ने ललिता बब्बर की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि फाइनल में पहली दस धावकों में स्थान बनाकर उन्होंने स्वयं और भारत को गौरवान्वित किया है। भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने भी पिछले कई ओलंपिकों के प्रदर्शन से इस बार बेहतर प्रदर्शन किया है। इसी तरह कुछ अन्य उल्लेखनीय प्रदर्शन भारतीय खिलाड़ियों ने किए हैं, हालांकि पोडियम पर खड़े होने का अवसर या तो कमियों के कारण या अंतिम क्षण में करमाकर की तरह खराब किस्मत के कारण अब तक किसी को नहीं मिला है।
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लेकिन इन व्यक्तिगत प्रदर्शनों पर गर्वित होना गलत होगा, क्योंकि ये प्रदर्शन देश में खेल को बढ़ावा देने की संस्थागत परिपक्वता के परिणाम नहीं हैं। लेकिन व्यक्तिगत प्रतिभा, खोज और सीमित सफलता की ये कहानियां व्यापक खेल प्रोत्साहन नीति के कारण नहीं हैं। जिस किसी ने जिमनास्टिक का फाइनल देखा होगा, उन्होंने ध्यान दिया होगा कि दीपा करमाकर नंगे पैर प्रदर्शन कर रही थीं, जबकि बाकी प्रतिस्पर्धी जिमनास्टिक के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए परिधान में थीं। उनके पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के साक्षात्कार से पता चलता है कि प्रशिक्षण की पर्याप्त सुविधा हासिल करने और दुनिया में उच्चतम स्तर की जिमनास्ट के रूप में गिने जाने लायक बनने के लिए उन्हें किन संघर्षों से गुजरना पड़ा है। ललिता बब्बर की कहानी भी इससे अलग नहीं है, क्योंकि वह भी महाराष्ट्र के सतारा जिले के दूरदराज के इलाके से उभरी हैं, जो भारत के ज्यादातर गांवों की तरह खेल सुविधाओं से वंचित है।

बत्तीस वर्ष पहले 1984 में लॉस एंजेल्स ओलंपिक में पी टी उषा ने देश को गौरवान्वित किया था और वह मामूली अंतर से कांस्य पदक से वंचित रह गई थीं और चौथे स्थान पर रही थीं। कांस्य पदक विजेता प्रतिस्पर्धी उनसे मात्र 1/100वें सेकंड के अंतर से आगे थीं। उषा के प्रदर्शन की त्रासदी सिर्फ उनकी नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय क्षति थी, क्योंकि महिला एथलेटिक्स में दिलचस्पी का उपयोग बुनियादी ढांचा तैयार करने और आधुनिक सामाजिक नजरिये को उषा को एक प्रेरणादायी एथलीट के रूप में तब्दील करने तथा ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए नहीं किया गया। दीपा करमाकर ने कहा है कि वह पदक जीतने के लिए फिर 2020 के ओलंपिक में हिस्सा लेंगी, लेकिन इस अत्यधिक प्रतिस्पर्धी क्षेत्र में नई चुनौतियों का सामना करने के लिए उनकी निजी प्रतिभा और समर्पण ही पर्याप्त नहीं होगा। वह इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनी रहें, यह सुनिश्चित करने के लिए उन्हें समर्थन और सहयोग देना चाहिए, न कि अकेले छोड़ना चाहिए। उनके प्रदर्शन को यों ही बेकार नहीं जाने देना चाहिए और एक राष्ट्रव्यापी खेल प्रोत्साहन कार्यक्रम शुरू करना चाहिए, जहां खिलाड़ियों को बेहतरीन कोच, उपकरण एवं वित्तीय मदद उपलब्ध कराए जाएं।
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सिडनी ओलंपिक में भारत ने मात्र एक कांस्य पदक जीता था और वह भी एक महिला कर्णम मल्लेश्वरी द्वारा, जो उच्चतम खेल क्षेत्र में व्यक्तिगत पदक जीतने वाली प्रथम भारतीय महिला बनीं। उनकी भी काफी प्रशंसा की गई थी, लेकिन उसके बाद क्या हम एक भी विश्व स्तरीय महिला भारोत्तोलक तैयार कर पाए हैं? सिडनी और रियो ओलंपिक के बीच 16 वर्षों का वक्त गुजर गया, लेकिन एक अरब की आबादी वाले देश में मात्र एक कांस्य पदक जीतने पर विलाप करने के बाद हमने कौन-सा कदम उठाया, ताकि यह निराशाजनक तस्वीर फिर न दोहराए। ओलंपिक में हमारे पास दो बड़ी सफलता की कहानियां हैं, जो लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत) राज्यवर्धन सिंह राठौर और अभिनव बिंद्रा के रूप में है। लेकिन राठौर को जहां भारतीय सेना की उत्कृष्ट शूटिंग सुविधा हासिल थी, वहीं बिंद्रा के पिता वित्तीय रूप से उन्हें बेहतर प्रशिक्षण सुविधा दे पाने में समर्थ थे।

भारत की सबसे प्रमुख समस्या है कि ओलंपिक के दौरान के उत्साह को छोड़कर पूरे वर्ष क्रिकेटरों के बेहद छोटे-से समूह को तवज्जो दी जाती है। क्रिकेट मार्केट फ्रेंडली खेल है, जो ढेर सारे प्रायोजकों को आकर्षित करता है। यही वजह है कि अभिभावक अपने बच्चों को क्रिकेट खेलने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि यदि एक-दो सीजन इंडियन प्रीमियर लीग में भी खेलने का मौका मिल जाएगा, तो वे काफी धन अर्जित कर लेंगे और खेलने की उम्र बीत जाने के बाद भी क्रिकेट में करियर बना लेंगे। लेकिन ऐसा अन्य खेलों के साथ नहीं है।

इसके अलावा भारत में लिंग, जाति एवं समुदाय के आधार पर भेदभाव भी है। जाना-माना तथ्य है कि लड़कियों को स्कूल में खेलने के लिए प्रेरित नहीं किया जाता और कुछेक लड़कियां, जो खेल का कौशल दिखाती हैं, उन्हें प्रगतिशील परिवारों में भी कहा जाता है कि इससे तुम्हारा करियर नहीं बनने वाला। दकियानूस समाज की सामान्य प्रतिक्रिया होती है कि चूंकि लड़कियों का भविष्य ससुराल में है, और ज्यादातर मामलों में ससुर और पति खेलने वाली बहू पसंद नहीं करते, इसलिए लड़कियों को खेलने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता। रियो की अंतिम पदक तालिका में भारत का चाहे जो स्थान रहे, लेकिन इस उत्साह को भुनाने की जरूरत सरकार नहीं भूले। गरीबी एक प्रमुख कारण है कि लोग अपने बच्चों को खेल को करियर बनाने नहीं देना चाहते और इससे रातोंरात पार नहीं पाया जा सकता। फिर भी उन बच्चों और युवाओं को सहायता उपलब्ध कराने की जरूरत है, जो बचपन के कुपोषण की चुनौतियों से ऊपर उठने में सक्षम हैं। अपने सामाजिक प्रचार में सरकार को एक नया आयाम जोड़ना चाहिए-बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और बेटियों को खेलने दो। इसी तरह खेल मंत्री को भारतीय खेलों के लिए एक दीर्घकालीन दृष्टिकोण तैयार करना चाहिए। ध्यान रहे कि मात्र कुछेक दशकों में ही चीन एक बड़ी खेल शक्ति बनकर उभरा है।
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वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदीः द मैन, द टाइम्स के लेखक
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