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इतिहास के सबक भविष्य की ठोकरें बन जाएंगे : ऐतिहासिक समझ की गलत करवट की सजा, कितनों को भुगतनी होगी

दुष्यंत
Updated Wed, 31 Aug 2022 09:27 AM IST

सार

कैंब्रिज के प्रोफेसर रिचर्ड इवान्स के एक व्याख्यान में कही गई बात याद आती है कि संचार के जिस युग में हम रह रहे हैं, खासतौर पर यूके में अलग-अलग संस्कृतियों से आए माता -पिता या दादा-दादी, नाना-नानी की संतानों को खास किस्म का राष्ट्रवादी इतिहास पढ़ाना संभव नहीं है, क्योंकि राष्ट्रवादी इतिहास के चयनित तथ्यों से आगे की जानकारियां भी उन्हें सहजता से मिल जाने वाली हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : Pixabay


हमारे घरों के बच्चे अक्सर इतिहास को एक उबाऊ विषय मानते हैं, उम्र में बड़े हो चुके लोगों को कहते सुना है कि घटनाएं और तारीखें याद करते- करते थक जाते थे हम: 'हिस्ट्री- ज्योग्रफी बड़ी बेवफा, रात को याद किया, सुबह हो गई सफा'। फिर अक्सर लोग अपने बीते जीवन को घटनावार, तिथिवार बताने लगते हैं, उन्हें नहीं पता होता कि वे इतिहास के जोन में आ चुके हैं, यह पर्सनल हिस्ट्री कहलाती है।


पर कमाल यह है कि सियासतदान इसे एक जरूरी विषय मानते हैं। वे फिर किसको, और कैसे अपने मन का इतिहास पढ़ाना, सिखाना चाहते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास के पूर्व प्रोफेसर बीएल भादानी हाल ही में एक दिन कह रहे थे-'यूक्रेन के इलाकों पर रूस का कब्जा हो जाने पर रूसी लोग यूक्रेन के इतिहास की पुस्तकों को जला रहे हैं। क्या यूक्रेन के लोग अपने इतिहास को भूल जाएंगे? शायद कभी नहीं। 


इसी प्रकार हमारे भारत में वैज्ञानिक आधार पर लिखे गए इतिहास को कोर्स से हटाकर नया इतिहास लिखा जा रहा है, क्या उपरोक्त दो बातों में साम्य नजर आता है?' उनकी बात से भी मुझे इतिहास लेखन की बुनियादी जरूरत और अहमियत का सवाल खड़ा होता दिखाई देता है। कौन-सा इतिहास हम नष्ट करना चाहते हैं, किसको बचाना, यही चयन पद्धति बहुत से सवालों का जवाब भी है, खुद में एक लाजवाब सवाल भी है। 


ऐतिहासिक समझ की गलत करवट की सजा कितने लोग भुगतते हैं, कई बार केवल कुछ लोग, कई बार लाखों... इतिहास लिखने के मकसद को लेकर याद करना जरूरी लगता है कि जब रामधारी सिंह ‘दिनकर’ इतिहास और संस्कृति विषयक लेखन कर रहे थे, कौन इनकार कर सकता है कि उनकी प्राथमिकता में नेहरूवियन भारत का सपना नहीं था? वह दृष्टि दिनकर जी के लेखन में आद्योपांत दिखाई देती है। उनकी किताब संस्कृति के चार अध्याय को हिंदी के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलना अकादेमी इतिहास की विरल घटना थी, जब गैर साहित्यिक या इतिहास की किताब को यह पुरस्कार दिया गया था।


कहने को कहा जा सकता है कि विज्ञान के आविष्कार विज्ञान के विकास, विषय के विस्तार के लिए होते हैं या मानव सभ्यता के हित के लिए? तो इतिहास की भी अहमियत केवल विषय के विकास पर कैसे मानी जानी चाहिए। पर दोनों मकसद साथ पूरे हो जाएं, ऐसे संयोग तो दुर्लभ होते होंगे। कभी या प्रायः दोनों मकसद आमने-सामने आकर खड़े हो जाते होंगे। यहीं चुनौती भी है, मुश्किल मार्ग भी है, सब इतिहास लिखने वाले इस चुनौती को कहां ठीक से निभा पाते होंगे। फिसलन होती ही होगी।


कैंब्रिज के प्रोफेसर रिचर्ड इवान्स के एक व्याख्यान में कही गई बात याद आती है कि संचार के जिस युग में हम रह रहे हैं, खासतौर पर यूके में अलग-अलग संस्कृतियों से आए माता -पिता या दादा-दादी, नाना-नानी की संतानों को खास किस्म का राष्ट्रवादी इतिहास पढ़ाना संभव नहीं है, क्योंकि राष्ट्रवादी इतिहास के चयनित तथ्यों से आगे की जानकारियां भी उन्हें सहजता से मिल जाने वाली हैं।
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कुछ तो वजह होती होगी कि इतिहास पढ़े लोगों को इतिहास न पढ़े लोगों से ज्यादा चतुर होने का कभी सच्चा, कभी झूठा एक वहम होता है, क्योंकि वे लंबे समय में चीजों को देख पाते हैं, उन घटनाओं के आगे- पीछे का एक बोध, एक इंट्यूशन उनमें बनने लगता है। वे घटनाओं को लंबी समय रेखा के एक बिंदु के रूप में देखते हुए अपने समय से आगे या पीछे देख या प्रिडिक्ट कर पाते हैं, तो यह भी इतिहास की एक अहमियत या उपयोगिता ही है।


इतिहास के मकसद के लिहाज से बताना ठीक लग रहा है कि इतिहास लिखने और कहानियां सुनाने में एक फर्क है कि इतिहास की किताब या घटना पढ़ते सुनने के अंत में आपको कथार्सिस वाला सुकून नहीं मिलता, कि अच्छे की जीत हुई, बुरे की हार... दुश्मन दोस्त बन गए या दो प्यार करने वाले लड़ते-झगड़ते, जूझते शादी तक पहुंच गए, इतिहास और कहानी को मिलाकर लिखने से ये मकसद पूरा होता है, पर तब इतिहास लहूलुहान होता है।


क्या ये बड़ा और भयावह सच नहीं है कि इतिहास को हमने अक्सर ये हक दिया है कि वह तय करे कि हमारा दोस्त कौन है, दुश्मन कौन, कौन शुभचिंतक। वह दोस्त- दुश्मन- शुभचिंतक एक व्यक्ति भी हो सकता है, एक समूह भी, एक कौम भी, एक मुल्क भी, एक पूरी सभ्यता भी। कितना सुंदर मुहावरा है जब लोग कहते हैं कि इतिहास न्याय करेगा.. करता है भला? वाकई इतिहास को न्याय करने दिया गया है? हम करने देते हैं? फुर्सत मिले तो सोचिएगा। (लेखक चर्चित फिल्म गीतकार- स्क्रिप्ट राइटर और स्वतंत्र इतिहासकार हैं)

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