लेह को केंद्र शासित प्रदेश बनाने से कई सकरात्मक बदलाव की संभावना तो है, पर वहां के पर्यावरण को स्थायी नुकसान पहुंचने का डर भी है। कायनात की खूबसूरत देन वहां सदियों तक बाहरी प्रभावों से बची रही, क्योंकि बाहरी आदमी के लिए वहां तक पहुंचना दूभर था। फिर पर्यटन व्यवसाय बन गया, हवाई जहाज आने-जाने लगे, पांच-पांच दर्रे पार कर मनाली से सड़क निकाल दी गई।
ईंधन चालित वाहनों ने धरती के इस अनछुए हिस्से पर अपने पहियों के निशान बना दिए। आधुनिकता आई, पर वही आधुनिकता आज उनकी त्रासदी बन रही है। आधुनिकता के साथ सीमेंट, लोहा बेचने वाली कंपनियां भी आईं। पर स्थानीय लोगों का दो दशक में ही कंकरीट से मोहभंग हो गया है। स्थानीय मिट्टी और रेत से बने पारंपरिक मकान लौट रहे हैं।
कुछ दशक पहले तक लेह-लद्दाख के दूर-दूर बसे बड़े से घरों के छोटे-छोटे गांवों में करेंसी का महत्व गौण था।
अपना दूध-मक्खन, अपनी भेड़ के ऊन के कपड़े, अपनी नदियों का पानी और अपनी फसल। न चाय में चीनी की जरूरत थी, न मकान में फ्लश की। पर सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा दिया और कुछ होटल बने, तो देखादेखी कुछ लोगों ने ईंट और सीमेंट से आधुनिक डिजाइन के मकान खड़े कर लिए, ताकि बाहरी लोग उनके मेहमान बनकर रहें, जिससे कमाई हो। घर-घर नल भी पहुंच गया। वहां ठंड के दिनों में औसतन प्रति व्यक्ति 10 लीटर व गर्मी में अधिकतम 21 लीटर पानी की जरूरत होती थी।
पर कंकरीट का इस्तेमाल बढ़ने से यह मांग औसतन 75 लीटर तक हो गई। अब पहाड़ों की ढलानों पर बसे मकानों के नीचे नालियों की जगह जमीन काटकर पानी तेजी से नीचे आने लगा, जिससे पारंपरिक और आधुनिक मकान ढहने लगे। ज्यादा पैसा बनाने के लोभ में जमीनों पर कब्जे और दरिया किनारे पर्यटकों के लिए आवास की प्रवृत्ति बढ़ी। वहां सैकड़ों ऐसी धाराएं है, जहां सालों पानी नहीं आता, पर जब ऊपर ज्यादा बर्फ पिघलती है, तो अचानक तेज जल-बहाव होता है। लेह-लद्दाख में पहले बरसात कम होती थी, पर जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मियों में कई बार बरसात होती है। पर्यटन बढ़ने से कचरा बढ़ा, जेनरेटर जैसे धुआं उगलने वाले यंत्र का इस्तेमाल भी बढ़ा।
वहां ऊपरी इलाकों में पशुपालक और निचले हिस्से में किसान रहते हैं। स्थानीय मिट्टी में रेत मिलाकर धूप में पकाई गई ईंटों से बने इनके पारंपरिक घरों की बाहरी दीवारों को स्थानीय ‘पुतनी मिट्टी’ व उसमें वनस्पतियों के अवशेष को मिलाकर ऐसा कवच बनाया जाता है, जो शून्य से नीचे तापमान में भी उसमें रहने वालों को उष्मा देता है। यह इलाका भूकंप के लिहाज से संवेदनशील तो है ही। ऐसे में पारंपरिक आवास सुरक्षित माने जाते रहे हैं। सीमेंट की वैज्ञानिक आयु 50 साल है, जबकि पारंपरिक तरीके से बने अनेक मकान, मंदिर और मठ हजार साल से खड़े हैं। यहां के पारंपरिक मकान तीन मंजिला होते हैं, जिनमें सबसे नीचे मवेशी और उसके ऊपर परिवार रहते हैं, तो सबसे ऊपर पूजा घर होता है।
बाहरी दुनिया के हजारों लोग अपने पीछे इतनी गंदगी और आधुनिकता की गर्द छोड़कर जा रहे हैं कि स्थानीय समाज का अस्तित्व खतरे में हैं। बाहरी दखल के चलते यहां अब चीनी का इस्तेमाल होने लगा, जिससे स्थानीय समाज में डाइबिटीज जैसे रोग घर कर रहे हैं। पर्यटन को पूरी तरह बाधित किए बगैर स्थानीय समाज को उनके पारंपरिक जीवन मूल्यों के बीच रहने देने की व्यवस्था करना ही इस समस्या का समाधान है।