राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर मीडिया को कैसे रिपोर्टिंग करनी चाहिए, इस बारे में हमारे यहां कभी सोचा नहीं गया। सरकार की तरफ से राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर मीडिया नीति बनाने की बात कही जा रही है। पर यह काम सिर्फ सरकार के बूते संभव नहीं है। मीडिया संगठनों और शैक्षिक संस्थानों को भी आगे बढ़कर इस संबंध में पहल करनी होगी।
हिटलर ने कहा था, 'प्रचार (प्रोपेगंडा) ही हमें सत्ता में लाया है। प्रचार ही हमें वे साधन मुहैया कराएगा, जिनसे हम विश्व विजेता बनेंगे।' हिटलर के इन शब्दों को आतंकवादियों ने पूरी तरह अपनाया है। आतंकी वारदातों से मिलने वाले प्रचार से वे मजबूत होते जाते हैं। इसलिए ब्रिटेन की लौह ललना मारग्रेट थैचर के शब्दों को उद्धृत करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने पिछले दिनों कहा कि यदि मीडिया चुप रहे, तो आतंकवाद एक झटके में खत्म हो जाएगा। आतंकी निर्दोष लोगों को क्यों मारते हैं? इसलिए कि ऐसी घटनाओं से उन्हें प्रचार मिलता है। यदि वे दस लोगों को मार देते हैं और खबर नहीं छपती, तो ज्यादातर लोगों को पता नहीं चलेगा और वे आतंकित होने से बच जाएंगे।
इसका यह मतलब नहीं कि आतंकी वारदातों की खबरें ही न छापी जाएं। ऐसे में तो लोकतंत्र आत्माविहीन हो जाएगा। पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अजित डोभाल का कहना है कि ज्यादातर मौकों पर मीडिया को सही जानकारी भी मुहैया नहीं करवाई जाती, ऐसे में, जहां से भी उन्हें खबर मिलती है, वे प्रसारित कर देते हैं। ऐसी खबर से जनता आतंक से लड़ने को तैयार होने के बजाय आतंकित ज्यादा हो जाती है। इसलिए सुरक्षा एजेंसियों की यह जिम्मेदारी बनती है कि पहले वे घटना के बारे में अपनी राय स्पष्ट कर लें, फिर मीडिया को वह खबर दें।
उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर मीडिया नीति बनाने की भी बात कही है। वर्ष 1955 में मीडिया नीति बनी थी, उसके बाद इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर मीडिया को कैसे रिपोर्टिंग करनी चाहिए, इस बारे में कुछ सोचा नहीं गया। कभी सेना मुख्यालय की तरफ से युद्ध संवाददाताओं के लिए तीन महीने का कोर्स चलाया जाता था, जो अब एक महीने का हो गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद हालात और खराब हो गए। ज्यादातर पत्रकारों को युद्ध की रिपोर्टिंग तो दूर, मामूली आतंकी वारदात की रिपोर्टिंग भी नहीं आती। ऊपर से चैनलों के स्टुडियो में बैठे एंकर मामूली घटना पर जिस तरह दहाड़ने लगते हैं, जबर्दस्ती बिठाए गए पाक जनरलों या पत्रकारों से बदसुलूकी करते हैं, उससे स्थिति और असह्य हो जाती है।
मुख्यधारा का अंग्रेजी मीडिया पश्चिमी मूल्यों का अनुसरण करता है। जबकि पश्चिमी मीडिया अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करता है। सीएनएन और बीबीसी जैसे चैनलों ने खाड़ी युद्ध के दौरान अमेरिकी भोंपू का काम किया था। दूसरी बार हुए खाड़ी युद्ध में भी उनकी बंधक (एम्बेडेड) पत्रकारिता की पोल खुली थी। बीती सदी के नब्बे के दशक में कश्मीर से बाहरी पत्रकारों को खदेड़ने के बाद वहां की पत्रकारिता एकपक्षीय हो गई। ज्यादातर अखबार पृथकतावादियों के हाथों के खिलौना बन गए। पर दिल्ली या न्यूयॉर्क के पत्रकारों ने भी श्रीनगर से आने वाली खबरों या पाक प्रायोजित झूठी खबरों को ही सत्य मान लिया। वे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई को मानवाधिकार हनन कहने लगे। प्रेस की आजादी के नाम पर वे सब दृश्य दिखाए जाने लगे, जिनसे आतंकवादियों को फायदा पहुंचे। यह सब इसलिए भी हुआ, क्योंकि हमारे पास कोई मीडिया नीति नहीं थी। यह काम अकेले सरकार के बूते संभव नहीं है। मीडिया संगठनों और शैक्षिक संस्थानों को भी आगे बढ़कर इस संबंध में पहल करनी होगी।