हाल में ही एक डिटर्जेंट के रंगरंजित विज्ञापन ने कई तरह की छींटाकशियां झेलीं! इसमें एक प्यारी साइकिल सवार बच्ची अपने मुसलमान साथी को झक सफेद पायजामा-कुर्ते में मस्जिद छोड़ आने की एक जुगत भिड़ाती है। जुगत यह कि वह खुद पर ही गली में खड़े तमाम बच्चों के गुब्बारे तब तक झेलती जाती है, जब तक उनका स्टॉक खत्म नहीं हो जाए। जब तक वे दूसरी खेप की होली के लिए गुब्बारे भरेंगे, तब तक उसका मुसलमान साथी नमाज पढ़ चुका होगा, तैयार हो चुका होगा, होली की हुड़दंग में शामिल होने को!
एक फ्लैश, एक कौंध में जनजीवन के सात रंग उजागर करने की यह तकनीक विज्ञापन ने कविता से ही ली है। रूपक और दृष्टांत बनते ही तब हैं, जब मैक्रो-माइक्रो, दो धरातलों के सत्य एक कौंध में उमड़कर झप्पी लगा लें या दो ध्रुवांत उमगकर गले मिल लें। कहना न होगा कि एक कौंध में भारतीय जनजीवन के कई रंग उजागर कर दिए गए हैं।
यह हमारे जनजीवन का एक प्रबल पक्ष है कि बच्चों की अंतःचेतना में भी अब तक यह बात दर्ज है कि प्रकृति के सर्वसमावेशी बृहत्तर सत्य के आगे अपना क्षुद्र अहंकार विसर्जित करने का नाम बंदगी है और इस बंदगी के कई ढंग हैं। जैसे नृत्य की, गायन की, खाने-पहनने की, हंसने-बोलने की हजार शैलियां हैं, बंदगी के भी कई ढंग हैं और हर ढंग उतना ही वाजिब है। आस्था मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है, पर इसकी अभिव्यक्ति पर भी जॉन स्टुअर्ट मिल की यही बात लागू होती है कि ‘युवर लिबर्टी एंड्स व्हेयर माई नोज बिगिन्स।’ आप अपनी छड़ी किसी भी दिशा में, किसी भी तरह से घुमाने को स्वतंत्र हैं, लेकिन तभी तक, जब तक वह किसी की नाक से न टकराए यानी आपकी स्वाधीनता किसी और की स्वाधीनता में बाधक न हो।
अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्, कहते हुए चित्त-विस्तार को ही जीवन का परम ध्येय देखने वाली सभ्यता को यह भी नहीं शोभता कि किसी को पराया माने। उसके लिए जो गरिमापूर्ण है, वह तो अमीर खुसरो अपनी कव्वाली में सदियों पहले कह गए : छाप-तिलक सब छीनी रे मो से नैना मिलाय के। अपने ही रंग रंग लीनी रे मो से नैना मिलाय के।
बात दो व्यक्तियों की ही नहीं, दो संस्कृतियों की भी है। जब दो संस्कृतियां आंखें मिलाती हैं, प्रीतिकलश का एक सूफियाना सिलसिला घटित होता है और अंत में दोनों एक दूसरे को अपने-अपने रंग रंग लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कृष्णलीला में रास के अंत तक कृष्ण राधा के कपड़े पहन लेते हैं, राधा कृष्ण के। सोचिए तो कितनी उदास और उबाऊ होगी एकरंगी दुनिया जहां कोई पारस्परिकता न हो, सहकारिता के बदले स्पर्द्धा, गिरहकट स्पर्द्धा ही जीवन का केंद्रीय भाव हो जाए।
सामने वाले को अपने रंग रंग लेने का उल्लास एक सहज उल्लास तभी तक है, जब तक सामने वाले को भी वह छूट दी जाए कि वह आपको अपने रंग रंग ले! यह पारस्परिकता ही होली का मर्म है। दूसरा बड़ा एहसास जो होली के साथ जुड़ा है, वह प्रकृति का आईना बन जाने का है। चैत के आरंभ में धरती की धानी चूनर पर सतरंगी फूल खिले होते हैं-रंग बिरंगे फूल बनकर हम भी धरती को निहाल कर देने वाली अनूठी खुशबू से सराबोर कर दें। सम्मिलित वैभव हो हमारा!
बचपन में हमें सिखाया जाता था कि कम से कम एक दिन तो यह ऐसा है, जब गरीब-अमीर, अनुसूचित जाति-सवर्ण, यहां तक कि औरत-मर्द के बीच की घेरेबंदियां भी ढह जाती हैं। अब 'बुरा न मानो होली है', के इस उद्घोष में कई विषम सुर भी निनादित सुनाई पड़ जाते हैं। हंसी-खुशी, रस-रंग जितनी दूर, जितनी देर फैल सके, अच्छा है। ऊंच-नीच, भेदभाव की संरचनाएं सदा के लिए टूट जाएं, तो ही अच्छा है। संसाधन और अवसर बराबर बंटें, लज्जा समेत हर सद्गुण सिर्फ स्त्री धन न रहे। कहते हैं न कि लज्जा औरत का गहना है और धीरज और त्याग-सेवा-ममता, सब सद्गुण औरत का गहना हैं, मर्द बेचारे भी इससे महरूम क्यों रहें, थोड़ा-सा उनके हिस्से भी कुछ आ जाए।
ग्लोबल वार्मिंग के इस युग में जिस हरी घास पर क्षण भर बैठने की बात अज्ञेय ने कही थी, वह घास भी अब हरी न रही। फिर भी होली से ठीक पहले चलने वाली हवाओं में विरह का एक सूफियाना रंग होता है। कोयल की कूक और हृदय की हूक एक साथ ठनकती है। बचपन में हारमोनियम पर हमें राग बहार के ये बोल गवाए जाते, तो अपने अज्ञात अदेखे प्रिय के लिए आंखें भर-भर आतीं : पिया बिदेस अजहुं नहीं आए, सहा न जात, सखि दुख अपार। अमराई में खाली हिंडौला झूलता दीखता तो भी भीतर से रुलाई फूटतीं, क्या जाने किसके लिए!
दिवाली-होली के धूम-धड़ाके वंचितों और वृद्धों को उदास छोड़ जाते हैं। गौर से देखिए, तो वे आपको अबीर के उन ठोंगों की तरह दीखेंगे, जो होली की अगली सुबह बचे हुए खानों के साथ निरादृत पड़े रहते हैं। क्या हम उनका जीवन फिर से रंगरंजित नहीं करने का कोई उपक्रम नहीं कर सकते?
बेखयाली, मदहोशी, निजता का संकीर्ण घेरा खुद होलिका की बड़ी गोद है, जिसमें हमारी अनंतचेता न्यायसिद्ध करुणा आग से घिरी बैठी है। हमें इंतजार है, अपने ही भीतर से उठते एक महाप्राण झोंके का, जो होलिका पर पड़ी यह अग्निरोधक चदरिया उड़ाकर हमारी न्यायवृत्ति, हमारी करुणा के कंधे डाल दे और उसका मार्ग प्रशस्त करे।
इस मौसम में मुझे सबसे ज्यादा याद आती है काठ के घोड़े पर सवार बहुरुपियों की, ठेलों पर बिकने वाली बर्फ की खुरचन पर सतरंगी शरबत डालकर बनाई गई लॉलीपॉप की, जो मजे में चूसते हुए हम मुहल्ले की भाभियों, मामियों, मौसियों, चाचियों और बुआओं से मस्ताना गीत सुना करते थे, भर फागुन बुढ़ऊ देवर लागे, भर फागुन...।
हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री