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सिर्फ कानून से नहीं रुकेगी जासूसी

Tue, 03 Mar 2015 07:48 PM IST
शिवदान सिंह
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देश की सार्वभौम संप्रभुता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा का चोली-दामन-सा साथ है। यहां संप्रभुता का अर्थ है, देश की आधारभूत आर्थिक-राजनीतिक सीमाओं की सुरक्षा, सांप्रदायिक सद्भाव, आंतरिक सुरक्षा, ऊर्जा एवं प्राकृतिक वातावरण के क्षेत्रों में पूर्ण सुरक्षा एवं किसी प्रकार का बाहरी हस्तक्षेप अथवा दबाव न होना।
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मगर हाल ही में प्रकाश में आया पेट्रोलियम एवं ऊर्जा मंत्रालयों का जासूसी कांड बताता है कि देश में आर्थिक,ऊर्जा एवं आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्रों में हम पूर्ण सुरक्षित नहीं हैं। इस जासूसी कांड को 'पेट्रोगेट' के नाम से जाना जा रहा है। जांच में यह भी पता चला है कि इस जासूसी का जाल देश के पेट्रोलियम, कोयला, ऊर्जा, रक्षा, पर्यावरण, उड्डयन एवं केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालयों तक फैला हुआ है।

सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी पोस्टरों में दिखाया जाता है कि दुश्मन के जासूस सुरक्षा घेरे को भेदकर सूचनाओं की चोरी कर सकते हैं। पेट्रोगेट में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। मंत्रालयों के कर्मचारियों ने ही सूचनाएं चोरी कीं। असल में, केंद्रीय कर्मचारियों के छठे वेतन आयोग ने सिफारिश की थी कि केंद्रीय मंत्रालयों एवं कार्यालयों की अच्छी साफ-सफाई एवं देखरेख के लिए हाउस कीपिंग के कार्य को निजी हाथों में दे दिया जाए। इसी कारण यह कार्य ठेकेदारों को दे दिया गया है। ये ठेकेदार इन कार्यों को करने के लिए मल्टीटास्क कर्मचारी रखने लगे।
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मल्टीटास्क यानी एक कर्मचारी पानी पिलाने से लेकर फोटोकॉपी करने तक जैसे कई कार्य कर सके। ये सारे कर्मचारी अस्थायी होते हैं। रोजगार की सुरक्षा न होने के चलते ये कर्मचारी सूचनाएं एकत्र करने वाली कंपनियों के आर्थिक प्रलोभनों में आसानी से आ जाते हैं। पेट्रोगेट मामले में ही देखें, तो मल्टीटास्क स्टाफ होने के कारण आरोपियों का मंत्रालयों के हर विभाग एवं कमरों में आना-जाना था, और इसी का फायदा कुछ कॉरपोरेट कंपनियों ने उठाया। अक्सर असावधानी के कारण भी फोटोकॉपी इत्यादि के लिए फाइलें इन अस्थायी कर्मचारियों के हाथ लग जाती हैं, जो बाद में कॉरपोरेट कंपनियों तक पहुंच जाती हैं। उन दस्तावेजों के आधार पर वे सरकार पर अपने हित में नीतियां बनाने का दबाव बनाने का प्रयास करती हैं।

हालांकि गोपनीय दस्तावेजों की जासूसी कोई नई बात नहीं है। 70 के दशक में सेना मुख्यालय में हुई जासूसी से लेकर 2004 में नौसेना मुख्यालय में गोपनीय दस्तावेजों की चोरी तक का लंबा इतिहास रहा है। अंग्रेजों का बनाया ऑफिसियल सीक्रेट ऐक्ट इसी प्रकार की जासूसियों को रोकने के लिए है। इस अधिनियम के पालन की शपथ हर केंद्रीय कर्मचारी हर वर्ष लिखित रूप में लेता है। मगर विडंबना है कि यह शपथ केवल फाइलों तक ही सीमित रह जाती है। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका में राष्ट्रपति तक अपनी फाइलें खुद संभालते हैं, ताकि उनका दुरुपयोग न हो सके, मगर अपने देश में वीआईपी कल्चर के कारण अतिमहत्वपूर्ण फाइलें भी अस्थायी कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दी जाती हैं। इसलिए सिर्फ कानून बनाने से ही जासूसी नहीं रुकेगी। वीआईपी संस्कृति के साथ ही व्यवस्था बदलने की भी जरूरत है।
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