हमारे देश में नेता जब भी साइकिल पर बैठते हैं, तो वही भाव होता है, जो आजादी से पहले फांसी चढ़नेवालों का होता था- हंसते-हंसते! गुमसुम या मुंह फुलाए हुए किसी नेता को मैंने साइकिल चढ़ते नहीं देखा। नेता का साइकिल चढ़ना कुछ-कुछ दूल्हे के घोड़ी चढ़ने जैसा होता है। वहां तो फिर भी मुंह में पान और हाथ में रूमाल रहता है, जिसकी वजह से उसका हंसते-हंसते घोड़ी चढ़ना नजर नहीं आता, मगर साइकिल में न जाने क्या बात है कि नेता के हाथ में आई नहीं कि उनके मुंह से हंसी छूटने लगती है। मैंने कई बार साइकिल की सवारी की है, लेकिन मजाल कि चेहरे पर जरा भी हंसी आ गई हो।
साइकिल पर नेता की चढ़ाई के अवसर यों तो कम ही आते हैं, लेकिन जब भी आते हैं, तो मुझे यही लगता रहता है कि देखना, हंसेगा जरूर। और नेता कभी मुझे निराश नहीं करते। मगर यह मेरी समझ में नहीं आया कि साइकिल और नेता की हंसी का क्या रिश्ता है। मुझे तो यह भी लगता है कि गंभीर से गंभीर नेता को भी अगर हंसते हुए देखने की जिद है, तो उन्हें साइकिल पकड़ा दीजिए। आम आदमी साइकिल से गिर पड़े, तो लोग हंसने लगते हैं, मगर यहां नेता ने साइकिल पकड़ी नहीं कि आम जनता की भी बत्तीसी चमकने लगती है। शायद जनता को उम्मीद रहती हो कि नेता भी कहीं, आम आदमी की तरह साइकिल से गिर ही पड़े। मगर खुद नेता की हंसी का क्या मतलब हो सकता है? कहीं अपना डर छिपाने के लिए तो वे हंसने का सहारा नहीं लेते? जैसे जेल जाते हुए भी उंगली से विक्टरी का निशान बनाते हैं।
आप साइकिल पर हंसते-हंसते क्यों चढ़ते हैं? साइकिल से हंसी सहित उतरे नेता से मैंने पूछा। दरअसल, हम आम जनता को बताना चाहते हैं कि हम नेता होकर भी हंसते-हंसते साइकिल पर चढ़ सकते हैं, तो आम आदमी को भी पेट्रोल-डीजल वाहन के बजाय साइकिल पर चढ़ना चाहिए। साइकिल पर चढ़ने के बाद भी हमारी हंसी कायम है, तो मतलब साफ है कि आज भी साइकिल चलाना कितना मजेदार काम है।