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किसान को भी बनाएं भागीदार

Thu, 12 Mar 2015 08:31 PM IST
एम के वेणु
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भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर हो रही बहस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकेले पड़ते प्रतीत हो रहे हैं। सरकार की सहयोगी रही शिवसेना और अकाली दल इस नए अध्यादेश का विरोध कर रहे हैं, जिसमें औद्योगिक कॉरिडोर और आवासीय परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक-निजी भागेदारी के जरिये निजी क्षेत्र की तरफ से खेती की भूमि का अधिग्रहण करने की अनुचित ताकत राज्य को देने का प्रावधान किया गया है। यहां तक कि भारतीय किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच जैसे संघ परिवार से जुड़े संगठन भी, जिनसे इस मुद्दे पर विचार-विमर्श नहीं किया गया था, इसके कुछ कड़े प्रावधानों में संशोधन चाहते हैं। मुद्दा यह नहीं है कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को विकासोन्मुख होना चाहिए या नहीं, असल सवाल यह है कि जब राज्य सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजनाओं के लिए किसानों की जमीन लेने की कोशिश करे, तो किसानों को उससे असहमत होने का लोकतांत्रिक अधिकार है या नहीं? मोदी और सरकार में उनके प्रमुख सलाहकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के बारे में इसी महत्वपूर्ण मुद्दे को समझ नहीं पाए हैं।
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अपने लच्छेदार भाषणों में मोदी भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को सीधे तौर पर सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और आवास से जरूर जोड़ सकते हैं, मगर दिक्कत यह है कि उनकी इस बात पर यकीन करना लोगों के लिए मुश्किल हो रहा है। लोकप्रियता की आड़ में कुछ भी बोल देने वाले मोदी की बातों से ऐसा मालूम होता है, मानो सड़क, बिजली, स्कूल और अस्पताल की खोज हाल ही में हुई हो, और उनके सत्ता संभालने से पहले विकास के नाम पर कुछ भी न हुआ हो। उल्लेखनीय है कि विकास और जीडीपी विकास दर में बढ़ोतरी एक साथ हो सकती है। भारत में ऐसा हुआ भी है, मगर गैर-समावेशी ढंग से। 1991 में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के बाद से देश भर में किसानों की काफी भूमि अधिगृहीत की गई। पर बड़ा सवाल है कि क्या किसानों को इस विकास में अपना उचित हिस्सा मिला। सार्वजनिक-निजी भागीदारी के नाम पर बड़े औद्योगिक घरानों को जमीन के बड़े टुकड़े तो मिलते रहे, पर क्या हम समावेशी विकास का पर्याप्त स्वाद चख पाए?

दरअसल, अतीत में विकास के नाम पर जो कुछ भी हुआ है, उससे किसान अवगत हैं। अब वे ज्यादा जागरूक हो गए हैं कि अपनी जमीन को नेताओं और व्यापारियों के हवाले करने के बाद किस तेजी से उसके दाम बढ़ जाते हैं। किसान इसलिए आंदोलित हैं, क्योंकि उन्हें एहसास हो चुका है कि सरकार और व्यापारियों ने किस तरह उन्हें धोखा दिया है। नरेंद्र मोदी को यह साधारण-सी बात समझनी चाहिए कि किसान को सरकार पर भरोसा नहीं रह गया है, और वह नहीं चाहता कि ज्यादा मुनाफा दिलाने के लिए सरकार उनका प्रतिनिधित्व करे। यहां तक कि जिस गुजरात के विकास के कसीदे पढ़े जाते हैं, वहां के हाल देखकर भी किसानों को न्याय दिलाने की दिशा में ज्यादा भरोसा नहीं जगता।
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बात केवल गुजरात की नहीं है, दूसरे राज्यों में भी ऐसे तमाम उदाहरण मिलते हैं, जब ऊर्जा या शैक्षिक परियोजनाओं के लिए जमीन आवंटित करने के लिए मुख्यमंत्रियों ने अपनी विवेकाधीन शक्तियों का पांच से दस गुना ज्यादा उपयोग किया। विकास के नाम पर अधिगृहीत की गई जमीन का अगर ऑडिट किया जाए, तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। साफ है कि जो दांव पर लगा है, वह किसानों का भरोसा है।

अब तक न तो केंद्र और न ही राज्य सरकारों ने किसान समुदाय की दीर्घावधि जरूरतों को लेकर संवेदनशीलता दिखाई है। हालिया इतिहास किसानों के साथ हुए इस अन्याय की गवाही देता है, जिसकी अनदेखी एनडीए सरकार नहीं कर सकती। प्रधानमंत्री हवा में विकास की बात नहीं कर सकते। उन्हें अतीत का भी सामना करना पड़ेगा, जिसमें एनडीए के पहले कार्यकाल का अनुभव भी शामिल है। इसके अलावा उन्हें संघ परिवार के भीतर से आ रही आवाजें भी सुननी होंगी। हरियाणा में भाजपा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अमर उजाला को बताया कि वह अधिग्रहण से पहले किसानों की मंजूरी लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक-निजी परियोजनाओं के लिए वह केवल बंजर जमीन का ही अधिग्रहण करेंगे। जबकि जमीन अधिग्रहण अध्यादेश बहुफसली जमीन के अधिग्रहण का भी प्रावधान करता है। आखिर क्या वजह हो सकती है कि भाजपा के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि वह जमीन के जबरन अधिग्रहण वाले अध्यादेश के प्रावधान का उपयोग नहीं करेंगे? खट्टर संघ परिवार के पुराने सदस्य रहे हैं। क्या वह संघ के नेतृत्व के कहे पर चल रहे हैं?

स्वदेशी जागरण मंच के एक महत्वपूर्ण नेता ने इस लेखक को बताया कि सामाजिक प्रभाव आकलन में बुराई नहीं है। परियोजना के लिए कर्ज देने से पहले विश्व बैंक जैसे वैश्विक वित्तीय संस्थान भी सामाजिक प्रभाव आकलन करते हैं। इसलिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में इस प्रावधान को केवल इसलिए हटा देने का कोई औचित्य नहीं है कि इससे परियोजनाओं में देरी होती है। यह शिकायत कारोबारियों की है कि इस आकलन में लगने वाले समय से निवेश पर बुरा असर पड़ता है। मगर सुशासन की बात करने वाले नरेंद्र मोदी को एक ऐसा तंत्र जरूर बनाना चाहिए, जिसमें सामाजिक प्रभाव आकलन तीन से पांच महीनों में पूरा किया जा सके। जबकि इस प्रक्रिया में लगने वाले समय को देखते हुए जमीन अधिग्रहण अध्यादेश में इसकी अवहेलना की कोशिश दिखती है।

अपनी गलतियों को समझते हुए एनडीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश में कुछ संशोधन प्रस्तावित किए हैं। इसके तहत उन परियोजनाओं की संख्या में कमी लाई गई है, जिनमें निजी क्षेत्र द्वारा किसानों की मंजूरी के बगैर जमीन लेने का अधिकार है। किसानों की मंजूरी के बगैर भूमि अधिग्रहण वाले मामलों में औद्योगिक कॉरिडोर के आकार को भी सीमित करने की कोशिश की गई है। इन मामलों में किसान के परिवार के किसी एक शख्स को स्थायी रोजगार देने की भी बात की गई है। कहना मुश्किल है कि इन छोटे-मोटे बदलावों से किसान कितना खुश होंगे। संशोधित कानून को पारित करने से पहले सरकार को किसान समुदाय के साथ गंभीर विमर्श जरूर करना चाहिए।
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