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अवसरों की सीढ़ी

रोहन संधु Published by: Raman Singh Updated Fri, 07 Feb 2020 07:02 PM IST
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शिक्षा - फोटो : a

इस नए दशक की शुरुआत करते ही हम शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) की दसवीं वर्षगांठ मना रहे हैं, जो अप्रैल, 2010 में लागू हुआ था। भले ही इस कानून को शासन और सीखने के परिणामों पर सीमित रखने के चलते इसकी आलोचना की जाती है, लेकिन पिछले दस वर्षों में स्कूली शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने की इसकी उपलब्धि से इन्कार नहीं किया जा सकता है। आरटीई ने इस क्षेत्र में कई हितधारकों के लिए एक आदर्श के रूप में भी काम किया है।



लेकिन अच्छी तरह से लागू होने के बावजूद भारत में सीखने का परिणाम बहुत कम है। शिक्षा की गुणवत्ता संबंधी चिंताओं को शायद ही कभी राजनीतिक प्राथमिकताओं के रूप में देखा जाता है। कम गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रणाली के चलते स्वास्थ्य देखभाल या कृषि की क्षमता का अभाव है। लेकिन इन चिंताओं की अब अनदेखी नहीं की जा सकती, खासकर मानव पूंजी के संकट के प्रकाश में, जो बेरोजगारी के आंकड़ों में परिलक्षित होता है। अब तक ऐसे संकटों में सहायता के लिए स्कूली शिक्षा में गहन सुधार के बजाय कौशल विकास मंत्रालय ही बनाया गया है। आगे बढ़ते हुए भारत को इस असंतुलन से खुद को बाहर निकालना होगा और शिक्षा को एक व्यापक मानव पूंजी ढांचे के तहत देखना होगा। आगामी दशक में भारतीय शिक्षा क्षेत्र को पैमाने और तत्व, दोनों पर ध्यान देना होगा। एक तरफ सीखने की समस्या का समाधान करना होगा, तो दूसरी तरफ शिक्षा व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्यों को फिर से निर्धारित करना होगा। अतीत में, यहां तक कि सबसे परिष्कृत शिक्षा नीतियां और पाठ्यक्रम ढांचे कमजोर प्रशासन के कारण अपने वादे पर खरा नहीं उतर पाए। शिक्षा क्षेत्र में शासन के स्तंभों को मजबूत करना निस्संदेह महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में हरियाणा, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश समेत कई राज्यों ने शिक्षा का संचालन करने के तरीके में बड़े बदलाव लाने का बीड़ा उठाया है। इनमें से कई राज्यों में शुरू में स्कूलों का एकीकरण किया गया।


स्कूलों की संख्या में सुधार के साथ बुनियादी ढांचे में सुधार, शिक्षकों, अग्रणी कर्मचारियों की पर्याप्त संख्या और इन कर्मचारियों की क्षमता में विकास निर्देशित हस्तक्षेप के लिए जरूरी है। इन सबके साथ सुधारात्मक कदम पर मजबूती से ध्यान देने की जरूरत है, ताकि छात्रों को ग्रेड स्तर की योग्यता हासिल करने में सक्षम बनाया जा सके।


राजस्थान में, जहां इंटरनेशनल इनोवेशन कार्प्स ने बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप, कैवल्य एजुकेशन फाउंडेशन और माइकल और सुसान डेल फाउंडेशन के साथ-साथ राज्य शिक्षा विभाग के साथ काम किया, राज्य सरकार ने अपने आदर्श कार्यक्रम के तहत गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचों और हेडमास्टरों व शिक्षकों की नियुक्ति को प्राथमिकता में रखते हुए करीब 10,000 मॉडल सेकेंडरी स्कूल (हर ग्राम पंचायत में एक) विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया। इन स्कूलों के हेडमास्टरों को बाद में पंचायत शिक्षा अधिकारी के रूप में नामित किया गया और अपने ग्राम पंचायत के अन्य स्कूलों, खासकर एक मॉडल प्रारंभिक स्कूल, को सिखाने के लिए प्रशिक्षित किया गया। ऐसे प्रयासों से चार वर्ष में शिक्षकों की रिक्तियां 50 फीसदी से घटकर 19 फीसदी पर आ गई और अग्रणी प्रशासन का एक कैडर बना, जो नियमित रूप से स्कूलों की निगरानी करता है। नेशनल एचीवमेंट सर्वे और बोर्ड के नतीजों, दोनों में माध्यमिक स्कूलों के परिणाम में सुधार के संकेत हैं।


अन्य राज्यों में भी इसी तरह के सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। जैसे, हरियाणा में ग्रे मैटर्स इंडिया के एक मूल्यांकन का अनुमान है कि 119 प्रखंडों में से 94 में छात्र अब ग्रेड स्तर पर योग्य हैं। इसका श्रेय मुख्यमंत्री कार्यालय से चलाए गए सक्षम हरियाणा कार्यक्रम को जाता है, जिसमें कई हस्तक्षेपों के साथ सुधारात्मक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया।


ऐसी सफलताओं के आधार पर नीति आयोग और तीन राज्य-ओडिशा, मध्य प्रदेश एवं झारखंड साथ-ई कार्यक्रम के माध्यम से ऐसे प्रयासों को बढ़ाने की प्रक्रिया में हैं। इसके अतिरिक्त नीति आयोग के नवीन स्कूली शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक के 30 में से 14 संकेत शासन प्रक्रिया से संबंधित हैं, जिनमें शिक्षकों की उपलब्धता, प्रशिक्षण, जवबदेही और पारदर्शिता शामिल हैं।


शिक्षा प्रणाली को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने के लिए राज्य की क्षमता के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना एक महत्वपूर्ण बदलाव है, और इन उदाहरणों से पता चलता है कि शिक्षा देने की राज्यों की क्षमता कैसे बेहतर हो सकती है। लेकिन उनकी सफलताओं के बावजूद इन्हें शुरुआती बिंदुओं के रूप मे देखना चाहिए। सबसे पहले ये प्रयास सार्वजनिक स्कूल प्रणाली पर केंद्रित हैं। ज्यादा सार्थक बदलाव के लिए सरकार को एक नियामक और शिक्षा में सुविधा प्रदाता के रूप में दिखना अनिवार्य है।
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भारत की शिक्षा प्रणाली मानकीकृत और महत्वाकांक्षी पाठ्यक्रम पर केंद्रित है, छात्रों को सीखने के स्तर और उच्च-दांव वाली बोर्ड परीक्षाओं के बजाय उम्र के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। जिसका परिणाम है, जैसा कि अर्थशास्त्री कार्तिक मुरलीधरन लिखते हैं, यह छंटाई प्रणाली बन गई है, न कि मानव पूंजी प्रणाली। शिक्षा प्रणाली के व्यापक उद्देश्यों को पुनर्परिभाषित करने की खातिर सक्रिय प्रशासनिक तंत्र का लाभ उठाने के लिए एक नई नीति का प्रयोग करना होगा। इसके लिए मूल्यांकन तंत्र के बुनियादी पुनर्रचना की जरूरत होगी, उच्च दबाव वाली परीक्षाओं से ध्यान हटाने के लिए सामूहिक व्यवहार परिवर्तन और हितधारकों (अभिभावकों, छात्रों, शिक्षकों, अग्रणी प्रशासकों एवं गैर सरकारी संगठनों) के बीच नई भागीदारी की जरूरत होगी, ताकि इन व्यापक उद्देश्यों की दिशा में उनके प्रयासों में तालमेल बिठाया जा सके।


परिणाम पर फोकस निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे व्यापक मानव पूंजी की रणनीति से समर्थित होना चाहिए। कुछ वर्षों में छात्रों की एक पीढ़ी, जो शायद अन्यथा शिक्षा हासिल नहीं कर पाती, आरटीई के कारण स्कूली शिक्षा का एक चरण पूरा कर लेगी। लेकिन अगले एक दशक में शिक्षा नीति की प्रमुख प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि स्कूली शिक्षा छात्र जीवन का अंत नहीं, बल्कि अवसरों की एक सीढ़ी है।


-लेखक हार्वर्ड केनेडी स्कूल से संबद्ध हैं।

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