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अंतरराष्ट्रीय सियासत: ऐतिहासिक बदलाव की तरफ बढ़ रहा ब्रिटेन... सहयोग व नवाचार के सहारे अधिक मजबूत बनने का अवसर

केएस तोमर
Updated Sat, 06 Jul 2024 06:12 AM IST

सार

कीर स्टार्मर से उम्मीद है कि भारत-ब्रिटेन संबंध पहले की तरह बने रहेंगे और लेबर पार्टी की नीतियां संभावनाओं के नए द्वार खोलेंगी।
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ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर (फाइल) - फोटो : एएनआई / रॉयटर्स


ब्रिटेन के कई पूर्व प्रधानमंत्रियों के भारत के साथ अच्छे संबंध रहे हैं, जिससे दोनों देशों के बीच मजबूत द्विपक्षीय संबंध बने। लेबर पार्टी का रुख भी भारत के प्रति सकारात्मक है। कीर स्टार्मर ने चुनाव अभियान के दौरान लगातार ब्रिटेन-भारत संबंधों को बढ़ावा देने, आर्थिक साझेदारी मजबूत करने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर सहयोग पर जोर देने की प्रतिबद्धता जताई है।


चौदह वर्षों के बाद ब्रिटेन में लेबर पार्टी के लिए नए युग की शुरुआत हुई है, जिसने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है। लेकिन नई सरकार के समक्ष कठिन चुनौतियां भी हैं, जिनका उसे सामना करना पड़ेगा। ब्रेग्जिट के बाद की वास्तविकताओं से निपटने और कमजोर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने से लेकर भारत और अमेरिका के साथ नाजुक संबंधों को संभालने तक, लेबर पार्टी की सरकार को कई मोर्चों पर जूझना पड़ सकता है।


लेबर पार्टी के कई उम्मीदवारों की जीत में अनिवासी भारतीयों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस चुनाव में ब्रिटेन स्थित 15 लाख अनिवासी भारतीयों की भूमिका उनकी पर्याप्त उपस्थिति एवं समुदाय में सक्रिय भागीदारी के कारण महत्वपूर्ण थी। ब्रिटिश भारतीयों के साथ अनिवासी भारतीय वहां एक प्रभावशाली मतदाता समूह हैं, जो अक्सर ऐसे मुद्दों पर लामबंद होते हैं, जो दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करते हैं।


कीर स्टार्मर और लेबर पार्टी के प्रति समर्थन के संबंध में, विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय मूल के मतदाताओं में लेबर पार्टी के प्रति झुकाव का कारण पार्टी का भारत के साथ ऐतिहासिक संबंध और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए उसकी पक्षधरता है। निश्चित रूप से कुछ अनिवासी भारतीयों ने अपनी प्राथमिकताओं एवं दृष्टिकोण के आधार पर कंजर्वेटिव एवं अन्य पार्टियों का भी समर्थन किया होगा।


भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने के अलावा मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) भी आगे बढ़ सकता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच इससे संबंधित वार्ता में पहले ही जबर्दस्त प्रगति हो चुकी है। अब जबकि भारत और ब्रिटेन में मैत्रीपूर्ण सरकारें सत्ता में आ चुकी हैं, इसलिए एफटीए को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जा सकता है। हालांकि दोनों देशों के रिश्तों में जटिलताएं भी हैं। मसलन, वीजा विनियमन, व्यापार अवरोधों और भू-राजनीतिक गतिशीलता जैसे मुद्दों को सावधानीपूर्वक प्रबंधित किया जाना चाहिए। नई सरकार को इन चुनौतियों का समाधान करने और दोनों देशों को लाभ पहुंचाने वाली साझेदारी के लिए सक्रिय कूटनीति की आवश्यकता होगी।


लेबर पार्टी को विरासत में संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था मिली है। आर्थिक विकास ठहर गया है, मुद्रास्फीति बढ़ गई है और सार्वजनिक ऋण अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है। नई सरकार के सामने ऐसी नीतियों को बनाने और लागू करने की चुनौती है, जो राजकोषीय जिम्मेदारी सुनिश्चित करते हुए विकास को बढ़ावा दे।
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ब्रिटेन की नई सरकार को घरेलू और विदेशी, दोनों ही स्तरों पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और ब्रेग्जिट के बाद के परिदृश्य को संभालने से लेकर अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को मजबूत करने और घरेलू चिंताओं को दूर करने तक, आगे का कार्य बहुत बड़ा है। हालांकि, स्पष्ट दृष्टिकोण, व्यावहारिक नीतियों और सामाजिक न्याय और स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ लेबर सरकार के पास ब्रिटेन के लिए प्रगति और समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत करने का अवसर है। इन चुनौतियों का सामना करके और सहयोग व नवाचार की भावना को बढ़ावा देकर, ब्रिटेन वैश्विक क्षेत्र में अधिक मजबूत होकर उभर सकता है।

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