दरअसल, सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी की हार की पटकथा लगभग उसी समय लिखी जा चुकी थी, जब बीते मई में निवर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने अचानक चुनाव की घोषणा करके पूरे देश को चौंका दिया था। वास्तव में कंजर्वेटिव पार्टी को यकीन नहीं था कि वे शरणार्थियों (खासकर मुसलमानों) की रिकॉर्ड संख्या को आने से रोक पाएंगे। इस चुनाव में कंजर्वेटिव ने कई वादे किए, जिनमें कुछ शरणार्थियों को रवांडा भेजने की बेहद विवादास्पद योजना भी शामिल थी।
दूसरी तरफ, ब्रिटिश जनता कई समस्याओं से जूझ रही थी। जैसे बढ़ती महंगाई ने उनके घर का बजट बिगाड़ दिया। इसके अलावा, उन्हें लगता है कि अनियंत्रित इस्लामी शरणार्थियों की समस्या 'ब्रिटिश जीवन-शैली' को बर्बाद कर रही है, कभी दुनिया भर में प्रशंसित शिक्षा प्रणाली बर्बाद हो रही है, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा ध्वस्त हो गई है, लोगों को रहने के लिए सस्ता घर नहीं मिल रहा है और युवाओं में बेरोजगारी बढ़ रही है। यहां तक कि प्रवासी भारतीय भी कंजर्वेटिव पार्टी से दूर जा रहे थे, क्योंकि ये समस्याएं उन्हें भी परेशान कर रही हैं।
चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाले इन मुद्दों से निपटने के बजाय निवर्तमान प्रधानमंत्री यूक्रेन युद्ध में रूस को हराने के लिए अमेरिकी रथ में सवार हो गए। करदाताओं का पैसा बेकार के प्रयासों में बर्बाद किया जा रहा है, जबकि यूक्रेन नष्ट हो चुका है।
असल में ब्रिटेन आज यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के अपने आत्मघाती कदम से जूझ रहा है, जिसने वहां की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से नुकसान पहुंचाया है। वह हताश होकर अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि बेहतर करना चाहता है, जबकि उसने वैश्विक मामलों में नाटकीय ढंग से अपनी कम हुई भूमिका को स्वीकार नहीं किया है। इन्हीं वजहों से संसदीय चुनावों में लेबर पार्टी ने ऋषि सुनक की कंजर्वेटिव पार्टी को आराम से हरा दिया।
लेबर पार्टी के उदय के लिए किसी लोकप्रिय नीति की तुलना में 'रूढ़िवादी विस्फोट' को ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। कई प्रयासों के बाद एक दशक पहले भी ग्रेट ब्रिटेन बड़ी मुश्किल से स्कॉटिश स्वतंत्रता के जनमत संग्रह से बच पाया था। इस तरह का प्रयास फिर से होगा, क्योंकि ब्रिटिश अर्थव्यवस्था गिरती जा रही है। स्कॉटिश लोग फिर से यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहते हैं। वैश्विक स्तर पर ब्रिटेन की प्रतिष्ठा बहुत नीचे गिर चुकी है। लंदन में अब वह बात नहीं रही। मई, 2024 में एक वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारी ने माना कि दुनिया का 40 प्रतिशत अवैध धन लंदन में आता है। भ्रष्ट राजनेताओं, नौकरशाहों, व्यापारियों आदि द्वारा पैदा किए गए काले धन के लिए इंग्लैंड दुनिया की सबसे बड़ी पनाह बन गया है। भारत के कई घोषित आर्थिक अपराधी लंदन में छिपे हुए हैं, जिनमें से कुछ लोग भारतीय बैंकों के साथ की गई धोखाधड़ी के खिलाफ मुकदमे का सामना करने के लिए भारत लौटने की अपेक्षा ब्रिटिश जेल में रहना पसंद करते हैं। जबकि ब्रिटेन ने जुलाई, 1989 में वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) के गठन में बहुत सक्रियता दिखाई, जिसका उद्देश्य मनी लॉन्डरिंग, आतंकवादियों को फंडिंग और सामूहिक विनाश के हथियारों की फंडिंग से निपटने के उपायों को विकसित करना था।
इंग्लैंड अतीतवाद से ग्रस्त है। वह कभी महान रह चुके अपने अतीत के साथ जीना पसंद करता है। जनवरी 2020 में, ब्रिटेन ने दुनिया के अग्रणी वैज्ञानिकों को आकर्षित करने के लिए फास्ट-ट्रैक वीजा देने की घोषणा की, जिसमें ब्रिटेन आने वाले योग्य लोगों की संख्या पर कोई सीमा निर्धारित नहीं थी। एक समय दुनिया का लगभग एक चौथाई हिस्सा ब्रिटेन के अधीन था। ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। हम भारत के लोगों ने ही दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य का विध्वंस किया, क्योंकि हमने गैर-उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसके कारण ब्रिटिश साम्राज्य ध्वस्त हो गया। 18वीं सदी के अंत में फ्रांसीसी क्रांतिकारी बर्ट्रेंड बारेरे ने एंगलटेरे (अंग्रेजों की भूमि) को 'दुकानदारों का देश' बताया था, जो ईमानदार होने का दिखावा करते हैं, लेकिन वास्तव में धोखेबाज होते हैं। फ्रांसीसी क्रांति के दौरान 'विश्वासघाती अंग्रेज' फ्रांस में एक आम कहावत बन गई थी।
सुनक ने हाल में कुछ गलतियां कीं, जिनका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। जब वह कंजर्वेटिव पार्टी का नेतृत्व करने के लिए चुनाव लड़ रहे थे, तब भी उनकी छवि को पार्टीगेट (कोरोना लॉकडाउन के दौरान प्रधानमंत्री निवास में बोरिस जॉनसन के साथ जश्न मनाने) से झटका लगा था। संभवतः इससे भी ज्यादा नुकसान उन्हें वित्तीय मामलों को लेकर पारिवारिक विवाद के कारण हुआ। इसने उनकी लोकप्रियता को भारी नुकसान पहुंचाया, क्योंकि कोविड सहायता योजना को लेकर उन्होंने अपनी अच्छी छवि बनाई थी, जिससे उन्हें परिवारों और व्यवसायों को बचाए रखने के लिए त्वरित कार्रवाई का श्रेय मिला था। हाल में उनकी आलोचना इसलिए हुई कि वह जीवन-यापन के संकट से जूझ रहे लोगों की मदद करने में सुस्त दिखे और लोगों से दूर होते दिखे। महंगी निजी वस्तुओं का दिखावा करने के चलते भी उनकी आलोचना हुई।
नवीनतम जनगणना के अनुसार, ब्रिटेन में गैर-ईसाई आबादी बढ़ रही है। अवैध प्रवासन के कारण मुसलमानों की संख्या वहां बढ़ रही है। इससे ब्रिटिश नाराज हैं। समय बदल जाता है, लेकिन मानसिकताएं स्थिर रहती हैं। यदि ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य नहीं होता, तो उसका वैश्विक प्रभाव सोमालिया के बराबर ही होता। हकीकत सामने है, लेकिन साम्राज्यवादी रवैया उसे स्वीकार करने से रोकता है। ऐसे में भला नस्लवादी अंग्रेज भारतीय मूल के ऋषि सुनक को कैसे बर्दाश्त करते? पता नहीं, सुनक ने इससे कुछ सबक सीखा या नहीं!