भारत में ज्यादातर 12वीं कक्षा के छात्रों की कहानी सिर्फ दो महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं में सफलता की खोज तक सीमित है। विशिष्ट इंजीनियरिंग संस्थानों के लिए जेईई और प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों के लिए नीट परीक्षा। उम्मीदवारों की संख्या और उपलब्ध सीटों के बीच भारी असमानता, जो दस फीसदी से भी कम है, इन परीक्षाओं में प्रतिस्पर्धा को कई गुना बढ़ा देती है। इससे एक ऐसे माहौल को बढ़ावा भी मिलता है, जहां दबाव पनपता है और छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है।
पिछले कई वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि कोटा के प्रेशर कुकर माहौल में छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं में किस तरह वृद्धि हुई है। 2022 में 15, 2019 में 18 और 2018 में 20 छात्रों ने आत्महत्या की थी। इस उच्च जोखिम वाले परिदृश्य के बीच राज्य की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। अपेक्षाकृत कमजोर वर्ग के बच्चों को कोचिंग देने के लिए विभिन्न कोचिंग संस्थानों के साथ सहयोग अनजाने में इन पृथक केंद्रों के अस्तित्व और कथित जरूरत को मजबूत करता है, जिससे युवाओं के दिमाग पर तनाव और बढ़ता जाता है।
नए वर्ष की शुरुआत हमें आत्मनिरीक्षण और पुनर्मूल्यांकन का अवसर दे रही है। कोचिंग संस्थानों का विनियमन किया जाना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है अभिभावक और समाज की तरफ से पड़ने वाले दबाव को कम करना, जो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भी छात्रों को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का सबसे बड़ा कारण है।
'प्रत्येक बच्चा अद्वितीय है', का मंत्र केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, इसे सामाजिक व्यवहार का आधार बनाने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि एक समावेशी शैक्षिक परिदृश्य का निर्माण हो, ताकि छात्रों पर बेवजह दबाव न हो। वर्ष 2024 की शुरुआत ऐसे शैक्षिक वातावरण को बनाने के संकल्प से होनी चाहिए, जिसमें विविध प्रतिभाओं को पनपने का अवसर मिल सके और हर बच्चा अपनी विशिष्टता के अनुसार कॅरिअर का चुनाव कर सके। यह महत्वपूर्ण क्षण एक परिवर्तनकारी यात्रा की शुरुआत का भी समय होना चाहिए, जिसमें शिक्षा कुछ प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की संकीर्ण सीमाओं को पार करती हो, क्योंकि ऐसा होने पर ही शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य में खरी उतर पाएगी।