चुनावों के इस मौसम में आजकल इतिहास और भूगोल के सम्यक ज्ञान को लेकर राष्ट्रव्यापी क्विज प्रतियोगिता चल रही है। कोई पंडित नेहरू की महानता को फीते से माप रहा है, कोई सरदार पटेल की धर्मनिरपेक्षता के बारे में बता रहा है, तो कोई किसी को विभाजन की जिम्मेदारी लेने को कह रहा है।
ऐसे में रामखिलावन ने अपने लिए क्विज मास्टर की भूमिका तलाश कर ली है। वह हर आने-जाने वालों, नाते-रिश्तेदारों, मित्रों-अमित्रों, बड़े-बूढों-बच्चों से मौके-बेमौके इतिहास और भूगोल से जुड़ी अबूझ पहेलियां पूछता रहता है।
अधिकांश लोग उसके सवाल सुनकर सिर खुजाते हुए आगे बढ़ लेते हैं। कुछ हठी लोग उल्टे उस पर ही अपने सवाल दाग देते हैं। मसलन, रामखिलावन से एक सज्जन टाइप आदमी ने नेल्सन मंडेला मार्ग पूछा, तो उसने उसके सामने सवाल रख दिया, पहले बताओ कि विनी मंडेला नेल्सन मंडेला की क्या लगती थीं?
सज्जन ने कहा, मैं आपके हर सवाल का जवाब दूंगा, बस, नेल्सन मंडेला मार्ग तक का भूगोल समझा दें। सुना है, वहां एक झुग्गी में बढ़िया दारू मिलती है। उसकी एक-दो घूंट अंदर गई नहीं कि तमाम इतिहास बाहर निकल आएगा।
रामखिलावन ने न कभी इतिहास पढ़ा, न भूगोल। उसे अपने स्कूल परिसर में लगी झड़बेरी के बेर का खट्टा-मीठा स्वाद और कमर पर पड़ने वाली मास्साब की छड़ी की ही स्मृति है। इसके बावजूद उसे लगता है कि वह एक बेहतरीन क्विज मास्टर है। उसके लिए इतिहास और भूगोल तो वही हैं, जो सत्ता की ओर जाने का रास्ता दिखाते हों।
इतिहास भी प्राय: वही रचते हैं, जिनका इतिहास ज्ञान न्यूनतम होता है। भूगोल की केवल सैद्धांतिक समझ रखने वाले कभी कोलंबस नहीं हुआ करते।
सत्ता पाने के लिए चुनावी सभाओं में अभी जो लोग ज्ञान बांट रहे हैं, उन्हें ही इतिहास-भूगोल के बारे में कितना ज्ञान है! अगर उन्हें सचमुच ज्ञान होता, तो वे तक्षशिला के बिहार में होने की बात कैसे कहते? इसके बावजूद इतिहास के किसी मास्टर ने उन्हें डांटा क्या?
सब जानते हैं कि ऐतिहासिक संदर्भों का इस्तेमाल राजनीति में मुनाफे के अर्थशास्त्र के तहत हमेशा ही होता आया है। यह शाश्वत सत्य है। फिर अकेले रामखिलावन को ही दोषी कैसे ठहराया जा सकता है! वह क्विज मास्टर की अपनी नई भूमिका में पूरी तरह संतुष्ट है और अपने सुनहरे भविष्य के प्रति आशावान भी।