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मैं केवल भक्ति पद रचता हूं

Sun, 17 Nov 2013 07:21 PM IST
शिवकुमार गोयल
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आंध्र प्रदेश के ताल्लपा गांव में वर्ष 1424 में पैदा हुए अन्नमाचार्य भगवान तिरुपति के अनन्य भक्त थे। वह भगवान श्रीकृष्ण, श्रीराम, महादेव, भगवती दुर्गा आदि सभी के प्रति भक्ति भाव रखते थे। वह मानते थे कि सभी अवतार एक ही प्रभु के विभिन्न रूप हैं।
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उनका कंठ अत्यंत सुरीला था। पहले वह अन्य साधु-संतों के रचे पद गाकर भक्ति का प्रचार किया करते थे, बाद में सरस्वती की उन पर ऐसी कृपा हुई कि स्वयं भक्ति गीत रचकर उसका गायन करने लगे।

कवि भक्त अन्नमाचार्य अपने प्रवचन में सदाचार पर बहुत जोर दिया करते थे। वह कहा करते थे, मानव शरीर बड़े भाग्य से प्राप्त होता है। उसे सत्कर्मों और भक्ति में लगाना चाहिए। किसी की न निंदा करनी चाहिए और न बेवजह प्रशंसा। भगवान की आराधना में वाणी का उपयोग करना चाहिए।
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विजयनगर साम्राज्य के राजा सालुव नरसिंह राय ने एक बार उनका गीत सुना, तो मंत्रमुग्ध हो उठे। वह उनके मित्र बन गए। मंत्री ने अन्नमाचार्य से एक बार अनुरोध किया कि वह यदि राजा की प्रशंसा में कुछ पद रच दें, तो उन्हें कई गांव इनाम में मिलेंगे। भक्त-कवि ने निर्भीकतापूर्वक उत्तर दिया, मैं केवल भगवान की प्रशंसा के पद रचता हूं और उन्हीं की भक्ति के लिए गाता हूं।
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अन्नमाचार्य ने अपने जीवन में 32 हजार पदों की रचना की। तिरुपति के वेंकटेश मंदिर के संकीर्तन भंडार में ताम्रपत्र में लिखित उनके असंख्य पद सुरक्षित हैं।
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